नई दिल्ली (पीटीआई)। सुप्रीम कोर्ट में आज अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले की सुनवाई होनी थी लेकिन यह बढ़ गर्इ है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई वाली नई पीठ ने कहा कि इस मामले की सुनवार्इ जनवरी 2019 में होगी। बता दें कि एक बार फिर आज अयोध्या की राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का मामला चर्चा में था। आज सुप्रीम कोर्ट में इलाहाबाद हार्इकोर्ट द्वारा 2010 में सुनाए गए फैसले के खिलाफ दायर हुर्इ याचिकाआें पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस संजय किशन कौल एवं जस्टिस के एम जोसफ की पीठ में सुनवार्इ होनी थी।

निर्णय साक्ष्यों के आधार पर लिया जाएगा
सुप्रीम कोर्ट ने बीते 27 सितंबर को 1994 के अपने उस फैसले पर पुनर्विचार के मुद्दे को पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ को सौंपने से साफ मना कर दिया था। 1994 के फैसले में कहा गया था कि मस्जिद इस्लाम का अनिवार्य अंग नहीं है।चीफ जस्टिस के पद पर उस समय दीपक मिश्रा आसीन थे। एेसे में उनकी अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने 2:1 के बहुमत से अपने फैसले में कहा था कि इस मामले में निर्णय साक्ष्यों के आधार पर लिया जाएगा। इसके पहले के फैसले इसमें प्रासंगिकता नहीं रखते हैं।

जस्टिस एस अब्दुल नजीर असहमत थे
जस्टिस अशोक भूषण ने अपने और चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की ओर से फैसला सुनाते हुए कहा था कि अब उन्हें यह देखना है कि कि 1994 में पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने किस संदर्भ में यह फैसला सुनाया था। हालांकि खंडपीठ के तीसरे सदस्य जस्टिस एस अब्दुल नजीर ने दोनों न्यायाधीशों से असहमति व्यक्त किया था। जस्टिस एस अब्दुल नजीर ने कहा था कि क्या मस्जिद इस्लाम का अंग है। इस पर धार्मिक आस्था को ध्यान में रखते फैसला करना होगा। एेसे में इसके लिए विस्तार से विचार करने की जरूरत है।

तीनों पक्षों में जमीन बराबर से बांट दी जाए

सुप्रीम कोर्ट ने बीती 27 सितंबर को कहा था कि भूमि विवाद पर दीवानी वाद की अगली सुनवाई 29 अक्टूबर को होगी। मस्जिद इस्लाम का अनिवार्य अंग है या नहीं, यह मामला तब उठा जब तीन न्यायाधीशों की पीठ इलाहाबाद के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर सुनवाई कर रही थी। इलाहाबाद हार्इकोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने 30 सितंबर, 2010 को 2:1 के बहुमत में फैसला सुनते हुए कहा था कि कि 2.77 एकड़ जमीन को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला में बराबर-बराबर बांट दिया जाए।

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