राज्य में एक लाख 78 हजार से अधिक शिक्षकों की नियुक्ति के लिए अभ्यर्थियों के प्रमाण पत्रों के सत्यापन के मामले में शिक्षा विभाग और बिहार लोक सेवा आयोग (बीपीएससी) के बीच का विवाद थमने की बजाय और गहरा गया है। दोनों के बीच तल्खियां और बढ़ गई हैं। शिक्षा विभाग ने शनिवार को आयोग को कड़ी आपत्ति के साथ पत्र लिखकर उसकी स्वायत्तता पर सवाल खड़ा किया और आयोग के लिखे जवाबी पत्र को भी लौटा दिया, बल्कि मुख्य सचिव द्वारा शिक्षकों को प्रमाण पत्रों के सत्यापन कार्य से मुक्त रखने संबंधी निर्देश का हवाला देते हुए आयोग को नसीहत भी दे डाली। रोचक यह कि शिक्षा विभाग ने पत्र के माध्यम से आयोग से कई सवाल पूछा है और आयोग द्वारा जारी पत्र को बचकाना व मूर्खतापूर्ण हरकत बताया है। इसके साथ ही आयोग से पूछा है शिक्षक नियुक्ति परीक्षा का परिणाम से पहले प्रमाण पत्रों के सत्यापन क्यों?

आयोग बताए,कितनी परीक्षा का परिणाम घोषित करने से पहले अभ्यर्थियों के प्रमाण पत्रों का सत्यापन किया

शिक्षा विभाग के निदेशक (माध्यमिक) कन्हैया प्रसाद श्रीवास्तव ने शनिवार को अपने पत्र में आयोग से पूछा है कि इसके पहले कौन-कौन सी लिखित परीक्षा का परिणाम घोषित करने के पहले उसमें शामिल अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों का सत्यापन किया गया है। शिक्षा विभाग और आयोग के बीच गहराते विवाद की स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि शिक्षा विभाग के लिए आयोग ने जहां धृष्टता जैसे शब्द का उपयोग किया था, वहीं उसके जवाब में शिक्षा विभाग ने मूर्खतापूर्ण और विवेकहीन जैसे शब्द का प्रयोग किया है। शिक्षा विभाग ने यह पत्र आयोग के सचिव को भेजा है। अपने पत्र में शिक्षा विभाग ने आयोग से कहा है कि स्वायत्तता का अर्थ यह नहीं है कि आयोग कोई भी मूर्खतापूर्ण और विवेकहीन परंपरा स्थापित करे, जिससे शिक्षक नियुक्ति को लेकर बाद में सरकार के सामने वैधानिक अड़चन आए।

पत्र के मुख्य ङ्क्षबदु

- आयोग की कार्रवाई ध्यान भटकाव के लिए, यह अनावश्यक और अनुचित

- आयोग अपनी कार्रवाई के लिए स्वतंत्र और उसकी आंतरिक प्रक्रिया के निर्वहन के मामले में विभाग को कुछ नहीं कहना पर आयोग की आंतरिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप और दवाब बनाने का जो तथ्य दिया गया है, वह अनुचित और अस्वीकार्य

- आयोग शिक्षक नियुक्ति नियमावली के वितरीत कोई ऐसा कार्य नहीं करे, जिससे भविष्य में अनावश्यक न्यायालीय वादों का कारण बने