Chaitra Navratri 2020 : इस बार नवरात्र विशेष शुभ है।ऐस इसलिए क्योंकि इस बार ब्रह्म योग में घट स्थापना होगी। नवरात्र में कोई तिथि छय नहीं, वृद्धि नहीं। रेवती नक्षत्र में होगी घट स्थापना जो शुभ फल देने वाला योग है। पंचक भी है जो पांच गुणा अधिक फल देने में सक्षम है।

घट स्थापना मुहूर्त

1. प्रातः काल: 6:25 से 9:28 बजे तक (लाभ,अमृत के चौघड़िया में)। 2. पूर्वाह्न 11:05 से अपराह्न 12:44 बजे तक(शुभ के चौघड़िया में) 3. अपराह्न 12:20 से 1:38 बजे तक(अभिजीत मुहूर्त में) 4. सर्वोत्तम शुभ मुहूर्त: समय अपराह्न 12:20 बजे से 12:44 बजे तक, शुभ एवं अभिजित मुहूर्त में अति विशेष: इस बार आज के दिन मिश्री, काली मिर्च एवं नीम के पत्तों का सेवन करना त्रिदोषघ्न व सर्व रोग निवारक है। विक्रम संवत्सर 2077 में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा 25 मार्च 2020, बुधवार को सूर्योदय व्यापिनी है। इस दिन प्रतिपदा सांय 5:27 बजे तक रहेगी।इस दिन ब्रह्म योग अपराह्न 3:36 बजे तक रहेगा जो कि शुभ योग माना है। इस वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन रेवती नक्षत्र(शुभ फल देने वाला) भी होने के कारण घट स्थापना सूर्योदय के पश्चात उपरोक्त वर्णित शुभ के चौघड़िया एवं अभिजीत मुहूर्त में करना श्रेष्ठ होगा।घट स्थापना का श्रेष्ठ समय सूर्योदय एवं अभिजीत काल माना जाता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा "सम्मुखी" शुभ होती है। अतः उसे ही ग्राह्म करनी चाहिए। "अमायुक्त" प्रतिपदा में पूजन नहीं करना चाहिए।

महासप्तमी/महाष्टमी

दिनांक 31 मार्च 2020 मंगलवार को सौभाग्य योग में अन्नपूर्णा परिक्रमा 27:50 बजे रात्रि से आरम्भ होकर दिनांक 1 अप्रैल 2020,बुधवार को दुर्गाष्टमी वाले दिन रात्री 27:42 बजे पर समाप्त होगी। महानवमी दिनांक 2 अप्रैल 2020,गुरुवार को पुनर्वसु नक्षत्र में महानवमी पूजन होगा। इस दिन मध्यान्ह कर्क लग्न में रामावतार। इस दिन चंद्र- पुनर्वसु युति अपराह्न 1:29 बजे तक रहेगी।

पूजन सामग्री

चावल, सुपारी, रोली, मौली, जौ, सुगंधित पुष्प, केसर, सिंदूर, लौंग, इलायची, पान, सिंगार सामग्री, दूध- दही,गंगाजल, शहद, शक्कर, शुद्ध घी, वस्त्र, आभूषण, विल्बपत्र, जनेऊ, मिट्टी का कलश, मिट्टी का पात्र, दूर्वा, इत्र, चंदन, चौकी, लाल वस्त्र, धूप- दीप, फूल, नैवेद्य, अबीर, गुलाल, स्वच्छ मिट्टी, थाली, कटोरी, जल, ताम्र कलश, रुई, नारियल आदि। पूजन विधि आज से नव संवत्सर प्रमादी नामक संवत्सर का विनियोग करना चाहिए। आज से चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का पूजन आरम्भ होता है। सम्मुखी प्रतिपदा शुभ होती है। अतः वही ग्राह्म है।अमायुक्त प्रतिपदा में पूजन नहीं करना चाहिए।

नवरात्र व्रत

स्त्री- पुरुष दोनों ही कर सकते हैं। यदि स्वयं न कर सकें तो पति- पत्नी, पुत्र अथवा किसी ब्राह्मण को प्रतिनिधि बनाकर व्रत पूर्ण कराया जा सकता है। व्रत में उपवास अयाचित (बिना मांगे प्राप्त भोजन), नक्त या एक मुक्त भोजन करना चाहिए। घट- स्थापना के लिए पवित्र मिट्टी से वेदी का निर्माण करें। फिर उसमें जौ या गेहूं बोयें तथा उस पर यथा शक्ति मिट्टी, तांबे, चांदी या सोने का कलश स्थापित करें।उपरोक्त्त सामग्री एकत्रित कर प्रथम मां दुर्गा का चित्र स्थापित करें एवं पूर्वमुखी होकर मां दुर्गा की चौकी पर लाल वस्त्र बिछायें। मां दुर्गा के बायीं ओर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर चावल के नौ कोष्ठक, नवग्रह एवं लाल वस्त्र पर गेहूं के सोलह कोष्ठक षोडशमातृ के बनाएं, एक मिट्टी के कलश पर स्वास्तिक बनाकर उसके गले मे मौली बांधकर उसके नींचे गेहूं या चावल डाल कर रखें। उसके बाद उस पर नारियल भी रखें। नारियल पर मौली भी बांधे,उसके बाद तेल का दीपक एवं शुद्ध घी का दीपक प्रज्ज्वलित करें एवं मिट्टी के पात्र में मिट्टी डालकर हल्का सा गीला कर उसमें जौ के दाने डालें। उसे चौकी के बाईं तरफ कलश के पास स्थापित करें। अब सर्व प्रथम अपने बाएं हाथ में जल लेकर दायें हाथ से स्वयं को पवित्र करें और बार- बार प्रणाम करें। उसके बाद दीपक जलाएं एवं दुर्गा पूजा का संकल्प लेकर पूजा आरम्भ करें। दीपक स्थापन पूजा के समय घृत का दीपक भी जलाना चाहिए तथा उसकी गंध, अक्षत, पुष्प आदि से पूजा करें।

दीपक स्थापन मंत्र इस प्रकार है भो दीप ब्रह्मरूपस्त्वं हर्यान्धकारिनिवारक। इमा मया कृतां पूजां गृहंसतेजः प्रवर्धय। कुछ लोग अपने घरों में दीवारों पर अथवा काष्ठपट्टिका पर चित्र बनाकर इस चित्र की तथा घृतदीपक द्वारा अग्नि से प्रज्ज्वलित ज्योति की पूजा अष्टमी अथवा नवमी तक करते हैं।

कुमारी-पूजन

कुंवारी- पूजन नवरात्र व्रत का अनिवार्य अंग है।कुमारिकाएं जगतजननी जगदम्बा का प्रत्यक्ष विग्रह है। इसमें ब्राह्मण कन्या को प्रशस्त माना गया है।आसान बिछाकर गणेश, बटुक कुमारियों को एक पंक्ति में बिठाकर पहले "ॐ गं गणपतये नमः" से गणेशजी का पंचोपचार पूजन करें फिर "ॐ बं बटुकाय नमः" तथा "ॐ कुमाये नमः" से कुमारियों का पंचोपचार पूजन करें।इसके बाद हाथ में पुष्प लेकर मंत्र से कुमारियों की प्रार्थना करें।इसके बाद अष्टमी या नवमी के दिन कढ़ाई में हलवा बनाकर उसे देवीजी की प्रतिमा के सम्मुख रखें तथा "ॐ अन्नपूर्णाय नमः" इस मंत्र से कढ़ाई का पंचोपचार-पूजन करें। तदोपरान्त हलवा निकालकर देवी मां को नैवेद्य लगाएं।इसके बाद कुमारी बालिकाओं को भोजन कराकर उन्हें यथाशक्ति वस्त्राभूषण दक्षिणादि दे कर विदा करें।

विसर्जन

नवरात्र समाप्त होने पर दसवें दिन विर्सजन करना चाहिए। विसर्जन से पूर्व भगवती दुर्गा का गंध, अक्षत, पुष्प आदि से उत्तर- पूजन कर निम्न प्रार्थना करनी चाहिए रूपम देहि यशो देहि भाग्यम भगवती देहि मे पुत्रानदेहि धनमदेहि सर्वान कामामश्र्चदेही मे महिषधि महामाये चामुण्डे मुण्डमालिनी आयुरारोग्यमेशरचार्य देहि देवि नमोस्तुते। इस प्रकार प्रार्थना करने के बाद हाथ में अक्षत एवं पुष्प लेकर भगवती का निम्न मंत्र से विसर्जन करना चाहिए। गच्छ- गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थानम परमेष्चिर। पूजाराधनकाले च पुनरागमनाय च। इति। विशेष : नवरात्र में प्रतिदिन मार्कण्डेय पुराण में संकलित दुर्गा- सप्तशती स्तोत्र का पाठ के उपरांत हवन अवश्य करें।इससे महामारियों, बाढ़, अग्नि, भूकंप आदि आपदायें समाप्त होंगी।

- ज्योतिषाचार्य पंडित राजीव शर्मा बालाजी ज्योतिष संस्थान, बरेली

Posted By: Vandana Sharma