उद्योग संगठन ऐसोचैम ने दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बैंगलोर समेत आठ शहरों में 800 परिवारों का सर्वे किया. सर्वे के मुताबिक कोचिंग उद्योग तेज़ी से बढ़ रहा है और अब उसकी लागत क़रीब 17,000 करोड़ रुपए तक हो गई है.

एसके गुप्ता डीएमसी एजुकेशन नाम से कोचिंग संस्था चलाते हैं जो आज इतनी बड़ी हो गई है कि बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध है. गुप्ता बताते हैं, "हमने तीस साल पहले पांच बच्चों के साथ सीए की कोचिंग से शुरुआत की थी, अब विज्ञापनों की मदद से हम पाँच से 6,000 बच्चों को सालाना पढ़ा रहे हैं. दिल्ली, राजस्थान, चंडीगढ़, नोएडा, गाज़ियाबाद और देहरादून में हम फ्रैंचाइज़ी के ज़रिए अपना काम बढ़ा रहे हैं."

अपनी कामयाबी का राज़, गुप्ता मध्यम वर्ग की बढ़ती आमदनी बताते हैं. साथ ही उनके मुताबिक नौकरी पाने का बेहतर और छोटा रास्ता मानी जाने वाली तकनीकी शिक्षा की ओर रुझान बढ़ा है. बस यही वजह है कि दाख़िले की परीक्षा के लिए कोचिंग की मांग भी बढ़ गई है.

कोचिंग की ज़रूरत

लेकिन स्कूली शिक्षा के साथ-साथ कोचिंग लेने का चलन भी बढ़ा है. रिज़वान दिल्ली में छोटे स्तर की प्लाज़मा कोचिंग चलाते हैं. उनके पास सरकारी और प्राइवेट स्कूल दोनों से बच्चे पढ़ने आते हैं.

रिज़वान कहते हैं, "बड़े-बड़े स्कूलों के बच्चों के लिए ये फ़ैशन जैसा है, वो घर पर कोचिंग लेना पसंद करते हैं, मैंने ख़ुद नोएडा के एक मशहूर स्कूल में पढ़ने वाली लड़की को तीन विषयों में ट्यूशन दी और 50,000 रुपए लिए." रिज़वान के मुताबिक निजी स्कूलों के बच्चों में कोचिंग के इस चलन से सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों पर भी दबाव पड़ता है.

बनारस से दिल्ली पढ़ाई करने आए मोहित कुमार गुप्ता दसवीं कक्षा के छात्र हैं. मोहित कहते हैं, "सरकारी स्कूल है तो अध्यापक ठीक से नहीं पढ़ाते, फिर पेंचीदा सवालों को हल नहीं कर पाते, मेरी कक्षा में तो 98 फ़ीसदी बच्चे कोचिंग लेते हैं."

सफलता का फॉर्मूला

पटना के एक निजी स्कूल से पढ़ाई पूरी कर अब दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज में पढ़ रहे पुश्किन शानिव एमबीए की तैयारी कर रहे हैं.

उनका कहना है कि बिना कोचिंग की मदद के ख़ुद तैयारी करने की सोची थी लेकिन उनके सीनियर छात्रों का अनुभव था कि व्यवस्थित पढ़ाई इसी तरीक़े से होती है तो उन्होंने भी कोचिंग लेनी शुरू कर दी.

पुश्किन ने बीबीसी को बताया, "मदद तो होती है, नुक़सान भी होता है, हफ़्ते में छह दिन क्लास होती है, एक ब्रेक के साथ छह घंटा पढ़ाते हैं और तरीका इतना पेशेवराना है कि लगता है कि हम ग्राहक हों, पर वही तरीका है अब."

पुश्किन का ये अनुभव विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानि यूजीसी के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर यशपाल को बेहद परेशान करता है. प्रोफ़ेसर यशपाल कहते हैं, "आपको महसूस कराया जा रहा है कि कोचिंग में सिखाए गए जवाबों से नंबर मिलने पर आप होशियार हो गए हैं, लेकिन ये रचनात्मकता और अलग सोचने की शक्ति को ख़त्म करता है, इस बड़े उद्योग ने शिक्षा का सत्यानाश कर दिया है."

उनका मानना है कि बेहतर छात्र की परिभाषा बेहतर नंबरो से हो ये सही नहीं है और ना ही बेहतर नंबर लाने के लिए परीक्षा की मौजूदा प्रणाली अच्छी शिक्षा को बढ़ावा देती है. यानि ज़रूरत सफलता का फॉर्मूला बेचने के व्यापार को बढ़ाने की नहीं बल्कि शिक्षा के दायरे और समझ को विकसित करने की है.

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