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-जिस जनपद या थाना क्षेत्र में रहता है पीडि़त, वहीं की पुलिस को दर्ज दर्ज करनी पड़ेगी रिपोर्ट

-डीजीपी ने सभी जनपदों के पुलिस अधिकारियों को दिए निर्देश

डीजीपी ने दिए हैं ये दिशा निर्देश

-कोई भी पीडि़त उसके निवास स्थान के थाने पर जाए तो उसका प्रार्थना पत्र लेकर दूसरी कॉपी उसे दी दी जाए और साइबर सेल को इसकी सूचना दी जाए.

-क्रेडिट, डेबिट संबंधी डाटा व पिन नंबर के लीक होने के कारण अपराध से संबंधित समस्या होने पर पीडि़त को उन्हें लॉक करने में मदद की जाय.

-ई-मेल आदि हैक हुए हों या किसी अन्य प्रकार से सूचना लीक हुई हो तो ई मेल अकाउंट को फिर से कार्यशील व ब्लॉक करने के लिए तकनीकी सलाह दी जाय.

-साइबर सेल की विवेचना से यदि पेमेंट गेटवे से बैक के डाटा का लीक होना प्रतीत होता है तो बैंक पेमेंट गेटवे को पैसा वापस करने के लिए ई-मेल जरूर किया जाय.

-आवश्यकतानुसार बैंकों को डेबिट फ्रीज करने के लिए साइबर सेल द्वारा मेल किया जाए

-पीडि़त द्वारा दी जाने वाली तहरीर के घटना स्थल का संबंध उस थाने न होते हुए भी प्रथम सूचना दर्ज करते हुए उसकी पावती प्रदान कर दी जाए और इसकी जानकारी तुरंत साइबर सेल को दी जाय

-जनपद के एसपी, एएसपी अपराध द्वारा साइबर सेल के कार्यो की मासिक समीक्षा कर ई-मेल भेजने की कार्रवाई सुनिश्चित कराई जाए.

mukesh.chaturvedi@inext.co.in

PRAYAGRAJ: साइबर क्राइम के शिकार पीडि़त की तहरीर पर रिपोर्ट दर्ज करने में अब पुलिस टाल-मटोल नहीं कर सकेगी. पीडि़त के साथ घटना किसी भी थाना क्षेत्र या शहर में हुई हो, यदि घटना की तहरीर वह अपने तत्कालीन निवास वाले क्षेत्र के थाने में देता है तो पुलिस को उसकी रिपोर्ट दर्ज करनी पड़ेगी. इतना ही नहीं, रिपोर्ट लिखने के बाद पीडि़त व्यक्ति की मदद और तत्काल जांच भी की जाएगी. साइबर अपराध की शिकायतों को दर्ज करने में आनाकानी कर रही पुलिस की हरकत से वाकिफ हुए डीजीपी उत्तर प्रदेश ने यह आदेश दिए हैं. डीजीपी का ये आदेश अमल में आया तो साइबर क्राइम के शिकार व्यक्तियों को बड़ी राहत मिलना तय है.

भटकते रहते हैं पीडि़त

देखा जाता है कि लोगों का बैंक अकाउंट उनके निवासी वाले जनपद में होता है और वह नौकरी या पढ़ाई दूसरे शहरों में करते हैं. ऐसे में उनके साथ साइबर क्राइम होने पर पुलिस पीडि़त को उसके बैंक या शहर में भेज देती है. तर्क होता है कि घटना स्थल यहां का नहीं है. बैंक वहां है तो कार्रवाई भी वहीं से होगी. इस तरह लोग थानों का चक्कर लगाते रहते हैं. लेकिन उसका काम नहीं हो पाता. ऐसे में वे थक हार कर शिकायत ही नहीं दर्ज कराते.

झेलनी पड़ती है मानसिक टेंशन

साइबर अपराध में पहले यह पता नहीं चल पाता कि घटना कहां पर हुई है. थाने जाने पर पीडि़त को वहां भेज दिया जाता है जहां पर संबंधित बैंक या वित्तीय संस्थान होते हैं. लेकिन इसके बाद वहां से उसको फिर से उसी थाने में भेज दिया जाता है. पीडि़त थाने से बैंक और बैंक से थाने का चक्कर लगा कर थक जाते हैं. इस परिक्रमा को लगाने में उसका पैसा तो जाया होता ही है वक्त भी बर्बाद होता है. उसे मानसिक टेंशन अलग से झेलनी पड़ती है.

क्या हैं बैंक के नियम

यदि आपके साथ काई साइबर फ्राड हुआ है जिसका रुपया बैंक से निकला है तो पांच दिन के अंदर बैंक में शिकायत दर्ज कराएं. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के दिशा निर्देश हैं कि पांच दिन के अंदर सूचना मिलने पर ही बैंक द्वारा धोखाधड़ी पैसा वापस किया जाएगा. ये नियम बैंक के प्रावधान में है. लेकिन लोगों को इसकी जानकारी नहीं होती, जानकारी के अभाव में लोग चक्कर लगाते रहते हैं.

प्राप्त आदेश का पालन कड़ाई से करने के लिए सभी थाना प्रभारियों को निर्देश दिए गए हैं. हालांकि हमारे यहां पहले भी शिकायतों पर रिपोर्ट दर्ज की जाती रही हैं. जो नए आदेश मिले हैं उसका सख्ती से पालन कराया जाएगा.

नितिन तिवारी, एसएसपी प्रयागराज