देव दीपावली पर किये हुए स्नान,दान,होम यज्ञ और उपासना आदि का अनन्त फल मिलता है। इसी दिन सायं काल के समय नारायण ने मत्स्यावतार लिया था। इस कारण इसमें दिए हुए दानादि का दस यज्ञों के समान फल होता है।

वरान् दत्वा यतो विष्णुर्मत्स्यरूपोSभवत् तत:।

तस्यादत्तं हुतं जप्तं दशयज्ञफलं स्मृतम्।।

कार्तिकी को संध्या के समय करें इस मंत्र का जाप-

'कीटाः पतंगाः मशकाश्च वृक्षे जले स्थले ये विचरन्ति जीवाः।

दृष्ट्वा प्रदीपं न हि जन्मभागिनस्ते मुक्तरूपा हि भवन्ति तत्र।।

इस मंत्र के जाप से दीप दान करें तो पुनर्जन्मादि का कष्ट नहीं होता। स्कन्दपुराण के काशीखण्ड के अनुसार यदि इस दिन कृत्तिका में स्वामी(कार्तिकेय) का दर्शन किया जाए तो ब्राह्मण सात जन्म तक वेदपारग और धनवान होता है। ब्रह्मा पुराण के अनुसार इस दिन चन्द्रोदय के समय शिवा, सम्भूति,प्रीति,संतति,अनसूया,और क्षमा- इन छः तपस्विनी कृत्तिकाओं का पूजन करें क्योंकि ये स्वामिकार्तिक की माता हैं और कार्तिकेय, खंगी(शिवा) वरुण,हुताशन,और बालियुक्त धान्य ये सायंकाल द्वार के ऊपर शोभित करने योग्य हैं।

इस प्रकार करें पूजा

अतः इनका उत्कृष्ट गन्ध-पुष्पादि से पूजन करें तो शौर्य, वीर्यादि, धैर्य बढ़ते हैं। जो व्यक्ति पूरे कार्तिक मास स्नान करते हैं उनका नियम कार्तिक पूर्णिमा को पूरा हो जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन प्राय: श्रीसत्यनारायणव्रत की कथा सुनी जाती है। सायं काल देव मन्दिरों,चौराहों, गलियों पीपल के वृक्षों तथा तुलसी के पौधों के पास दीपक जलाये जाते हैं और गंगा जी को दीपदान किया जाता है। काशी में यह तिथि देव दीपावली महोत्सव के रूप मे मनायी जाती है।

इनके दान से मिलता है उचित फल

मत्स्यपुराण के अनुसार कार्तिकी को नक्तव्रत करके वृष दान करें तो शिवपद प्राप्त होता है। यदि गौ,गज, रथ, अश्व,और घृतादि का दान किया जाय तो सम्पत्ति बढ़ती है। ब्रह्मपुराण के अनुसार कार्तिकी को उपवास सहित हरिस्मरण करे तो अग्निष्टोम के समान फल होकर सूर्य लोक की प्राप्ति होती है। यह काशी का पर्व आज राष्ट्रीय पर्व का स्वरूप ग्रहण कर चुका है।

-ज्योतिषाचार्य पंडित गणेश प्रसाद मिश्र

Dev Deepawali 2019: तुलसी पर व गंगा में करें दीपदान, सत्यनारायण की कथा सुनने का है विशेष महत्व

Posted By: Vandana Sharma