-कम समय को देखते हुए छह की जगह दस घंटे कापियां जांच रहे हैं शिक्षक

-एक दिन में 35 कापियां जांचना है मानक, 85 कापियां जांच रहे हैं टीचर

-बड़ी संख्या में शिक्षकों की अनुपस्थिति बनी कारण, मूल्यांकन के लिए कुल चार दिन शेष

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ALLAHABAD: फिक्स्ड टाइम के भीतर टारगेट एचीव करने में तो यह एक्स्ट्रा वर्क टाइम काम कर जाएगा. लेकिन, इसका कापियों की चेकिंग पर क्या असर पड़ेगा? इसका अंदाजा भी लगा पाना मुश्किल है. इसका असर कामन मार्किंग के रूप में भी सामने आ सकता है क्योंकि न्यूरोलॉजिस्ट और साइकोलॉजिस्ट्स का कहना है कि दिमाग के काम करने की एक क्षमता है. इस क्षमता से ज्यादा लोड दिमाग पर पड़ने का मतलब है इरिटेशन. इस स्थिति में नार्मल विहैबियर की उम्मीद करना बेमानी है. इन बातों में दम है तो निश्चित तौर पर कापियों की चेकिंग की गुणवत्ता पर सवाल खड़े होंगे.

टारगेट, समय पर काम पूरा हो

यूपी बोर्ड की कापियों के मूल्यांकन के लिए ख्भ् अप्रैल तक की तिथि निर्धारित है. बोर्ड ऑफिसर्स ने कापियों के मूल्यांकन का शिड्यूल तय करते समय तमाम एहतियात बरते. इतने शिक्षकों की ड्यूटी लगाई गई कि एक टीचर एक कापी को कम से कम क्7 मिनट दे सके. इतने समय में हर सवाल के जवाब को पढ़ना और मार्क देना आसान था. अब स्टेप मार्किंग का दौर है. इसमें टाइम का फैक्टर ज्यादा मैटर करता है. लेकिन, इसके ठीक उलट परिस्थितियां कुछ ऐसी बनती गई कि टीचर्स पर प्रेशर बढ़ता चला गया. कई सब्जेक्ट के टीचर्स की अनुपस्थिति के चलते कुछ सेंटर्स पर नौबत यह आ गई कि एक कापी को जांचने के लिए सिर्फ चार मिनट का समय मिलने लगा. इसी टाइम में ओएमआर शीट भी फिल करनी है.

जो आ रहे पूरा दवाब उन्हीं पर

एक और खास बात यह है कि बोर्ड की कापियों के मूल्यांकन का काम समय से पूरा करने का प्रेशर सिर्फ उन पर है जो ड्यूटी पर आ रहे हैं. जो नहीं आ रहे उन्हें अभी तक सिर्फ धमकी ही दी जा रही है. कभी वेतन काटने की तो कभी कारण न बताने पर कठोर कार्रवाई की. इसका कोई असर अनुपस्थित टीचर्स पर नहीं है. वैसे में इनमें से दर्जनो ऐसे हैं जिनका रिटायरमेंट इसी जून में है. रिटायर होने के बाद उनका कोई क्या बिगाड़ लेगा? इस स्थिति के बाद भी निर्धारित समय के भीतर कापियों की चेकिंग का प्रेशर बढ़ा तो केन्द्र व्यवस्थापकों ने परीक्षकों का वर्किंग ऑवर बढ़ा दिया है. सब उन्हें सुबह आठ बजे केन्द्र पर पहुंचना है और शाम छह बजे तक कापी चेक करनी है. सेन्टर्स इंचार्ज की मानें तो इस समस्या के बारे में आलाधिकारियों को जानकारी दी गई है, लेकिन कोई सॉल्यूशन न मिलने से उन्होंने यह कदम उठाया है. सबसे खराब स्थिति भारत स्काउट गाइड इंटर कालेज सेंटर की है जहां करीब सवा दो लाख कापियों को जांचने के लिए करीब नौ सौ परीक्षकों में साढ़े पांच सौ ही रिपोर्ट कर रहे हैं.

थकान से प्रभावित होता है कार्य

मनोचिकित्सक डॉ. कमलेश तिवारी की मानें तो किसी भी कार्य का मानक बड़ी सूझबूझ के साथ तैयार किया जाता है. मानक से अधिक कार्य किए जाने का सीधा असर कार्य के रिजल्ट पर पड़ता है. कापियां चेक करना पूरी तरह से मेंटल वर्क है. दिमाग के लगातार काम करने से होने वाली थकान निश्चित तौर पर मूल्यांकन की गुणवत्ता पर असर डालेगी. कई बार ऐसा देखा जाता है कि काम को जल्द से जल्द समाप्त करने के चक्कर में परीक्षक सही तरीके से कार्य को संपादित नहीं करते. इसका असर बच्चों के रिजल्ट पर पड़ता है. परीक्षकों के अंदर भी अधिक कार्य करने के कारण कई मनोवैज्ञानिक समस्याएं पैदा होती है. खासतौर पर खीझ, स्ट्रेस जैसी समस्याएं. इसीलिए मानक बनाया जाता है ताकि वह अपना हंड्रेड परसेंट दे सकें.

..तो अंदाजे से कर देंगे मार्किंग

फेमस न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. एनएन गोपाल बताते हैं कि ऐसी कोई भी परिस्थिति बनने पर सीधा असर व्यक्ति की कार्य क्षमता पर पड़ता है. इस स्थिति में कई बार परीक्षक भी सिर्फ अंदाजे से मार्किंग कर देंगे. कई बार परीक्षकों के सामने ऐसी समस्या होती है कि उनका दिमाग भी पूरी तरह से खाली लगता है. इसके साथ ही गुस्सा, उलझन, स्ट्रेस जैसी समस्याएं कॉमन होती हैं. इस मानसिक स्थिति में किसी टीचर से फेयर वर्क की उम्मींद करना मुश्किल है. वैसे भी दिमाग लगातार छह घंटे काम करने की भी इजाजत नहीं देता. इस ड्यूरेशन में भी फेयर वर्क के लिए दिमाग को समय-समय पर ब्रेक की जरूरत होती है.

-दिमाग कोई मशीन नहीं है जो बटन दबाया और चलता रहे. लगातार प्रेशर में बढ़ने का असर आंखों पर भी पड़ता है और दिमाग पर भी. आंखों में जलन जैसा फील होने लगता है और दिमाग उलझन का शिकार हो जाता है. यह स्थिति किसी जजमेंटल वर्क के लिए बिल्कुल ठीक नहीं है.

डॉ. कमलेश कुमार तिवारी

मनोचिकित्सक

-काम के बोझ के कारण दिमाग पर पड़ने वाले स्ट्रेस के कारण लोगों में कई दूसरी शारीरिक समस्या भी खड़ी हो जाती हैं. जो स्वास्थ्य के लिहाज से भी ठीक नही है. जब काम करने वाला ही पूरी तरह से स्वस्थ नहीं होगा तो वह दूसरों के साथ न्याय कैसे कर पाएगा?

डॉ. एनएन गोपाल

न्यूरोलॉजिस्ट