समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, चुनाव आयोग ने तेल सचिव सौरभ चंद्र को लिखा है, ''यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है. इसके साथ ही तमाम बातों को ध्यान में रखते हुए आयोग ने फ़ैसला किया है कि क़ीमतें बढ़ाने के प्रस्ताव को टाला जा सकता है.''

चुनाव आयोग के इस फ़ैसले के साथ ही केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के पास इस मामले में कोई विकल्प नहीं बचा है. नई सरकार को ध्यान में रखते हुए गैस के दाम निर्धारित करने के लिए रंगराजन फॉर्मूले में प्रति दस लाख ब्रिटिश थर्मल यूनिट की मौजूदा क़ीमत 4.2 डॉलर से बढ़ाकर 8.3 डॉलर करने की बात कही गई है.

लेकिन नई सरकार भी शायद इस फॉर्मूले को पूरी तरह से लागू नहीं करना चाहेगी क्योंकि उर्वरक और ऊर्जा उद्योगों समेत कई हल्कों में इसकी कड़ी आलोचना की गई है.

रिलायंस पर असर
बहरहाल चुनाव आयोग के इस फ़ैसले की वजह से 85 प्रतिशत गैस उत्पादन और देश में इसकी बिक्री पर कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि तेल एवं प्राकृतिक गैस कार्पोरेशन (ओएनजीसी) ईंधन को मौजूदा क़ीमतों पर बेचना जारी रखेगा.
गैस की क़ीमत न बढ़ाई जाए: चुनाव आयोग
इसका असर सिर्फ़ रिलायंस इंडस्ट्रीज़ पर पड़ेगा जो घरेलू गैस का 15 प्रतिशत से कम उत्पादन करता है. असर की वजह ये है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के मौजूदा बिक्री अनुबंध 31 मार्च को समाप्त हो रहे हैं.

रिलायंस इंडस्ट्रीज़ और उसके ब्रितानी साझेदार बीपी पीएलसी गैस के दाम बढ़ाने के इच्छुक थे लेकिन आम आदमी पार्टी ने यह कहकर विरोध दर्ज कराया था कि इससे मुकेश अंबानी की फ़र्म को फ़ायदा होगा.

दिल्ली के मुख्यमंत्री रहते हुए केजरीवाल ने इस मामले में तेल एवं प्राकृतिक गैस मंत्री वीरप्पा मोइली, रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड के प्रमुख मुकेश अंबानी और अन्य ख़िलाफ़ गैस क़ीमतों को दोगुना करने की कथित साज़िश के लिए मामला दर्ज कराने का आदेश दिया था.

केजरीवाल ने चुनाव आयोग से भी आग्रह किया था कि वह गैस की क़ीमतें बढ़ाने के प्रस्ताव पर अपनी मंज़ूरी नहीं दे.

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