किसी ने चिट्ठी से बांध रखी है फ्रेंडशिप की डोर तो कोई बचपन से रोजाना साथ खाता है छोले-कुल्चे

फ्रेंडशिप की खातिर साथ में स्कूलिंग, ग्रेजुएशन और एक जैसा प्रोफेशन भी चुना

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MEERUT : फ्रेंडशिप डे यानी फ्रेंडशिप के कई रंग और रूप. जिसमें कभी टांग खींचती है फ्रेंडशिप तो कभी आखिर तक साथ देती है. कभी फ्रेंडशिप से खट्टी-मीठी नमकीन हो जाती लाइफ तो कभी सतरंगी रंगों से सजी सुनहरी दुनिया सी लगती है. हर फ्रेंडशिप अपने आप में अलग और अनूठी होती है. हालांकि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में सब कुछ बहुत तेजी से बदल रहा है और ऐसे बदलते वक्त में कुछ लोगों ने फ्रेंडशिप की तासीर को ठंडा नहीं होने दिया, फिर चाहे सोशल साइट्स के जमाने में चिट्ठी से सुख-दुख साझा करने की बात हो या साथ खाने का बहाना. इतना ही चाहे कुछ भी हो जाए लेकिन कुछ दोस्तों ने तो आज भी रोज मिलने के बहाने को ही रुटीन बना रखा है.

आज भी लिखती हैं चिट्ठी
शहर के बागपत रोड रहने वाली वंदना मल्होत्रा व गुरप्रीत कौर दोनों पक्की दोस्त हैं. फ्रेंडशिप भी ऐसी कि दोनों ने शहर से बाहर हरिद्वार जाकर साथ में स्कूलिंग की और उसके बाद रुड़की से साथ में पढ़ाई की. हालांकि पढ़ाई पूरी होने के बाद दोनों की अलग-अलग शहरों मे शादी हो गई. वंदना ने बताया उनकी सहेली की दिल्ली में मैरिज हो गई, तब से दोनों एक-दूसरे को चिट्ठियां लिखती हैं. यूं तो हम दोनों एक-दूसरे से कई सोशल साइट्स पर जुड़ी हुई हैं लेकिन चिट्ठी में अपने मन की बात लिखने में जो सुकून मिलता है वह किसी और चीज में नहीं. बकौल वंदना दोनों आज भी चिट्ठियों के जरिए ही सुख-दुख एक-दूसरे से साझा करती हैं, जैसे वे मिलकर किया करती थी. वंदना ने बताया कि जब भी दोनों में से किसी को कोई परेशानी होती है तो वे एक-दूसरे की मदद के लिए पहुंच जाती हैं.

साथ खाते हैं छोले-कुल्चे
बचपन से छोले-कुलचे खाते-खाते फ्रेंडशिप की डोर ऐसी बंधी कि करीब 42 साल बीत जाने के बाद भी दोनों दोस्त आज भी रोजाना एक साथ छोले-कुल्चे खाना नहीं भूलते. वेस्टर्न कचहरी रोड पर रहने वाले डॉ. मनोज सिंह और सुरेंद्र चौधरी बहुत पक्के दोस्त हैं. डॉ. मनोज डीएन कॉलेज में फिजिक्स के टीचर हैं और उनके दोस्त सरकारी स्कूल में. दोनों की 1977 से फ्रेंडशिप के बंधन में बंधे हैं. डॉ. मनोज ने बताया कि वो जब पांचवी क्लास में जीआईसी में थे तभी से दोनों कचहरी पुल पर छोले-कुल्चे खाने जाते थे. इसके बाद मेरठ कॉलेज से बीएससी की पढ़ाई भी साथ की. बकौल डॉ. मनोज आज जब दोनों टीचर हो गए है तो भी वो छोले-कुल्चे खाने उसी जगह जाते हैं. उनका बचपन का नियम है कि एक दिन एक तो दूसरे दिन दूसरा छोले-कुल्चे के पैसे देता है. जब तक दोनों एक-दूसरे को न देख ले मानो दिन अधूरा रहता है. डॉ. मनोज ने बताया कि स्कूल टाइम से अब तक उनका नाम दोस्तों ने जय और वीरु रखा हुआ है.

बिना मिले लगता है कुछ छूट गया
सीए अनुपम भारद्वाज, सीएम उमाकांत अग्रवाल व सीए प्रभात गुप्ता तीनों ही बचपन के गहरे मित्र हैं. बकौल सीए अनुपम भारद्वाज तीनों ने वीआरसी से साथ में स्कूलिंग की और साथ ही डीएन कॉलेज से बीकॉम. इसके बाद मेरठ में साथ रहकर तीनों ने सीए भी की है. तीनों रोजाना किसी एक जगह पर जरूर मिलते हैं. जब तक तीनों एक-दूसरे का न देख ले तो मानों ऐसा लगता है आज कुछ छूट गया. तीनों घूमने का प्लान भी साथ ही बनाते हैं.