यह व्रत महिलाएं परिवार की सुख समृद्धि और संतान की दीर्घायु, वास, सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं। भारत के उत्तरी पूर्वी क्षेत्र में इसे ललई छठ के नाम से जाना जाता है। भगवान श्री कृष्ण के भाई बलराम जी के जन्मोत्सव के उपलक्ष में ही हलषष्ठी व्रत मनाने की परंपरा है।यह परंपरा द्वापर युग से चली आ रही है क्योंकि बलराम का प्रधान शस्त्र हल और मुसल है। इसलिए उन्हें हलदर भी कहा जाता है। उनके ही नाम पर इस पुनीत पावन पर्व का नाम हलषष्ठी पड़ा है।

हल से जुता हुआ कुछ खाना वर्जित

इस दिन माताओं को महुआ की दातुन और महुआ खाने का विधान है। इस व्रत में हल से जुता हुआ फल व अन्य खाना वर्जित माना गया है। साथ ही साथ गाय के दूध-दही का प्रयोग भी निश्चित है। इस व्रत को विवाहित पहली संतान की प्राप्ति व नवविवाहित स्त्रियां करती हैं। तत्पश्चात हलषष्ठी माता की कथा सुनने का भी विधान है। हलषष्ठी व्रत से संतान सुरक्षित रहती है। माताएं संतान की दीर्घायु व सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत प्राथमिकता से करती है।

पूजा विधि

पूजन विधि में सर्वप्रथम प्रात काल स्नान आदि से निवृत्त होकर गोबर से धरती को लीप जाता है। इसके बाद छोटे से तालाब की आकृति बनानी चाहिए। उस पर झावेरी क्लास का फूल, गूलर व उसकी एक-एक साफा बांधकर एक जगह गांव दें।तत्पश्चात इनकी पूजा करें। भुना हुआ गेहूं, चना, धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, जौ, आदी चढ़ाएं और इसी के साथ हल्दी के रंग में रंगा हुआ वस्त्र व सुहाग सामग्री चढ़ाएं।

पूजा के बाद महिलाएं करती हैं ये कामना

पूजन के दौरान आराधना करें हे छठ माई या हलषष्ठी माता आपने गंगाद्वार कुश वर्क नील पर्वत और कनखल तीर्थ में स्नान करके भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त किया। सुख और सौभाग्य देने वाली हे ललिता देवी आपको बारंबार नमस्कार है। आप मुझे आंचल सुहाग दीजिए।

-ज्योतिषाचार्य पंडित दीपक पांडेय