मुंबई, (पीटीआई)हिंदी दिवस पर हिंदी सिनेमा और शोज में हिंदी साहित्य के लिए सिकुड़ती जगह की वजह तलाशने की कोशिश कर रहे लेखक और निर्देशक इसकी अलग-अलग वजहें गिनाते हैं।

हिंदी मर रही है
प्रसिद्ध फिल्मकार चंद्रप्रकाश द्विवेदी, जिन्होंने दूरदर्शन के स्वर्ण काल में 'चाणक्य' का नाट्य रूपांतरण किया, और 'पिंजर' और 'मोहल्ला अस्सी' जैसे कालजयी उपन्यासों को पर्दे पर उतारा है, कहते हैं कि भारतीय लेखकों को वैसी लोकप्रियता नहीं मिली जैसी कि उनके पश्चिमी समकक्षों की है। 'हमारा साहित्य इतना विशाल है, लेकिन भारतीय लेखकों को सामने लाने में गर्व का कोई भाव नहीं है। जब लोग हिंदी दिवस (14 सितंबर) मनाते हैं, तो मुझे लगता है कि हमने हार मान ली है, इसका मतलब है कि हिंदी मर रही है'।

शेक्सपियर के बारे में हर कोई लिखता है
चंद्रप्रकाश द्विवेदी, जो पृथ्वीराज चौहान पर यशराज के लिए अक्षय कुमार की मुख्य भूमिका वाली एक फिल्म का निर्देशन करने जा रहे हैं, मीडिया को भी अंग्रेजी उपन्यासों के नाट्य रूपांतरण के इर्द गिर्द ही प्रचार के लिए जिम्मेदार मानते हैं जो अक्सर अन्य भाषाओं साहित्य को लेकर गायब रहता है। 'जब भी कोई फिल्म, जो विलियम शेक्सपियर के साहित्य पर आधारित होती है, तो हर कोई इसके बारे में लिखता है, मीडिया इसके बारे में अधिक लिखता है। लेकिन हिंदी या किसी अन्य लेखक के काम पर बनी फिल्म की समीक्षा करते समय वे उसके बारे में नहीं जानते'। उन्होंने कहा, 'यह पूर्वाग्रह साफ नजर आता है। हमने कभी अपने भारतीय लेखकों को जनता तक ले जाने की कोशिश नहीं की। कितने लोग एमटी वासुदेव या काशीनाथ सिंह को जानते हैं? शेक्सपियर को सभी जानते हैं। भारतीय साहित्य को नजरअंदाज कर दिया गया है।' अतीत में, साहित्य और सिनेमा का कई कहानियों के साथ निकट संबंध था जैसे 'तीसरी कसम', 'सारा आकाश', 'नीम का पेड़' और 'शतरंज के खिलाड़ी' हिंदी साहित्य से ली गईं।

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व्यावसायिक सफलता की तलाश
प्रख्यात हिंदी लेखक और कवि उदय प्रकाश कहते हैं कि सत्यजीत रे और बिमल रॉय जैसे निर्देशक अक्सर अपनी फिल्मों के लिए साहित्य की ओर रुख करते थे, जिन्हें अब कालजयी माना जाता है। 'उन दिनों सिनेमा साहित्य को गुमनामी से निकालता ... लेकिन अब व्यावसायीकरण एक भयावह स्थिति में पहुंच गया है और लोग बस बॉक्स ऑफिस की संख्या को देख रहे हैं। 'जैसे ही बाहुबली' और 'गार्जियन ऑफ द गैलेक्सी' जैसी फिल्में आती हैं, बॉलीवुड में लोग ऐसी ही फिल्में बनाने की ओर रुख करना शुरू कर देते हैं जो उन्हें पैसे दे सकती हैं'। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है कि सिनेमा में साहित्य को पूरी तरह से नजरअंदाज किया जाता है लेकिन ऐसी फिल्में व्यावसायिक सफलता नहीं पातीं। 'यह बहुत कुछ निर्देशकों पर निर्भर करता है कि क्या वे साहित्य और सिनेमा के बीच एक पुल बना सकते हैं। लेकिन जल्द ही एक समय आएगा जब एक बफर जोन होगा, जहां फिल्म निर्माता साहित्य की ओर वापस आएंगे'।

साहित्य और सिनेमा के बीच पुल
समीक्षकों द्वारा सराही गई 'आर्टिकल 15' के सह-लेखक गौरव सोलंकी का मानना है कि भारतीय फिल्म निर्माता भारतीय साहित्य के संपर्क में नहीं आते हैं और इसीलिए अंग्रेजी का नाट्य रूपांतरण अधिक है। हिंदी की तुलना में अंग्रेजी साहित्य पर अधिक ध्यान दिया जाता है क्योंकि बहुत सारे फिल्म निर्माता भारतीय भाषा की किताबें नहीं पढ़ते हैं। अंग्रेजी साहित्य के नाट्य रूपांतरण का आकर्षण काफी नया है, एक समानांतर सिनेमा था जिसने भारतीय साहित्य को सिनेमा में ढाला।'समानांतर सिनेमा आज मौजूद नहीं है। हमारे पास मुख्यधारा या यथार्थवादी फिल्में हैं जो भारत की सामाजिक-राजनीति में निहित हैं। हमें कंटेंट की आवश्यकता है और हमारे पास पटकथा लेखक नहीं हैं और इसलिए पुस्तकों के साथ, आपके पास एक कहानी है।' वह कहते हैं कि कुछ स्टूडियो ने अपने दरवाजे खोल दिए हैं और हिंदी प्रकाशकों की ओर देख रहे हैं। 'कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी जैसे हिंदी और उर्दू के बहुत सारे लेखक अपनी किताबें लिखते हुए फिल्मों और टीवी के लिए लिख रहे थे। सोलंकी ने कहा, 'प्रकाशकों और साहित्यकारों को इस खाई को पाटने का प्रयास करना चाहिए। यह बेहतर होगा कि हमारे पास साहित्यकार हों, जो फिल्मों, टीवी और सीरिज के लिए काम करें। प्रकाशक रचनाकारों को सामग्री दे सकते हैं।'

हिंदी दिवस 2019: भारतीय सिनेमा से गायब होता हिंदी साहित्‍य

हिंदी सिनेमा से भारतीय साहित्य गायब
लेखक-निर्देशक राज निदिमोरू, जिन्होंने बेंगलुरू शहर की किवदंती नेल बा पर आधारित 'स्त्री' लिखी थी, इससे सहमति जताते हैं कि भारतीय साहित्य हिंदी सिनेमा से गायब है। 'हमारे साहित्य में एक गहराई है लेकिन दुर्भाग्य से हम इसे अनदेखा करते हैं। यह सही समय है जब हमें अपने साहित्य को देखना शुरू करना चाहिए और हमारे पास बताने के लिए बेहतरीन कहानियां हैं। अपने हिंदी साहित्य पर आधारित अधिक फिल्में और कहानियां, लेखकों को भी काफी प्रोत्साहित करेंगी।

कहानी के साथ न्याय करना जरूरी
लेखक-निर्देशक प्रदीप सरकार, जिनकी विद्या बालन, सैफ अली खान और संजय दत्त द्वारा अभिनीत 2005 की फ़िल्म 'परिणीता' शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के प्रसिद्ध उपन्यास का रूपांतरण थी, और व्यावसायिक रूप से सफल भी रही। उनका मानना है कि ऐसा इसलिए क्योंकि कहानी भारतीय लोकाचार में निहित थी। उनका मानना है कि किसी को केवल रूपांतरण का विकल्प तभी चुनना चाहिए, जब संस्कृति और पुस्तक की स्पष्ट समझ हो। इसे समझे बिना, आप कहानी के साथ न्याय नहीं कर सकते। यदि आप मुहावरे को जानते हैं, तो यह आसान हो जाता है। लेकिन अगर आप संस्कृति के मूल 'सुर' को नहीं जानते हैं, तो आप सिर्फ नकल करने का प्रयास करेंगे। "उन्होंने कहा कि फिल्म निर्माताओं की नई पीढ़ी तेज-तर्रार है, लेकिन धारदार फिल्में बनाने की दौड़ में कुछ पीछे छूट रहा है।

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पुरस्कार विजेता अभिनेता पंकज त्रिपाठी समृद्ध भारतीय साहित्य के प्रेमी हैं और अपने इंटरव्यू में वे अक्सर इस बात की चर्चा करते हैं कि कैसे साहित्य ने उनके अभिनय को आकार देने में मदद की। त्रिपाठी कहते हैं, 'मुझे साहित्य से प्यार है। मुझे महान रूसी लेखकों मैक्सिम गोर्की, एंटोन चेखव और हिंदी उपन्यासकार फणीश्वर नाथ 'रेणु' और केदारनाथ सिंह द्वारा लिखा वैश्विक और हिंदी साहित्य दोनों पसंद हैं। इसने अवचेतन रूप से मुझे मेरे पात्रों को बनाने में मदद की है'।

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