-शायर बोले हुस्न की जिद है कि हो रोशनी महफिल-महफिल, इश्क कहता है कि चरागों को बुझाया जाए

<-शायर बोले हुस्न की जिद है कि हो रोशनी महफिल-महफिल, इश्क कहता है कि चरागों को बुझाया जाए

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PRAYAGRAJ: ईश्वर शरण पीजी कॉलेज में शुक्रवार को उर्दू विभाग द्वारा मुशायरा एवं कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को समर्पित एक शाम बापू के नाम से आयोजित सम्मेलन में उर्दू और हिंदी के कई शायरों ने शिरकत की. इसमें बोलते हुए मुख्य अतिथि इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. रतनलाल हांगलू ने अपनी लिखी कविता एहसास सुनाते हुए कहा, 'मैं बड़ा सागर नहीं, नदी की प्यास हूं.'

हसरतें की नज्म भी पढ़ीं

कुलपति ने बशीर बद्र का मशहूर शेर पढ़ा, 'मुखालिफत से मेरी शख्सियत संवरती है. मैं अपने दुश्मनों का बड़ा एहतराम करता हूं.' उन्होंने कहा उर्दू सिर्फ मुशायरों की जबान नहीं है. मीर तकी मीर जैसे शायर ने पहली बार उर्दू शायरी में इंकलाब शब्द का प्रयोग किया. उर्दू भाषा सिर्फ आशिक, माशूका, गुलाब और बुलबुल तक सीमित नहीं. इसमें गालिब, मोमिन, फैज और बहादुरशाह जफर की भी छाप है. कुलपति ने उर्दू जबान में छपी गजलों की अपनी किताब हसरतें से कुछ नज्म भी पढ़ी. डॉ. शाइस्ता ने बचपन पर अपनी नच्म पढ़ी. कवि हरिश्चन्द्र पांडेय ने अपनी प्रसिद्धि कविता देवता पढ़ी. डॉ. रश्मि जैन, डॉ. हसीन अहमद, बसंत त्रिपाठी ने भी अपनी रचनाएं सुनाई. कार्यक्रम का संचालन कवि श्लेष गौतम ने किया.

शायरों का अंदाज-ए-बयां..

जलाल फुलपुरी ने पढ़ा..

ये इल्तजा है आज सभी अहले नजर से,

देखे तो कोई हिंद को बापू की नजर से.

शायर अख्तर अजीज ने पढ़ा

जेहन में फौरन बात ये आई जिक्र हुआ जब गांधी का,

चरखा, काता, सूत बनाया, कपड़ा पहना खादी का,

सत्य अहिंसा के रास्ते पर चलता रहा जो बरसों तक,

देश का लहजा आज भी उसके दर पर है फरियादी का.

हास्य रस के शायर फरमूद इलाहाबादी ने पढ़ा..

किसी इंसान ने इंसान को मारा तो क्या मारा,

दशहरे पर तुमने बुत-ए-बेजान को मारा तो क्या मारा.

साथ में यह भी पढ़ा..

वो जो शहर में था लफंगा अच्छा खासा,

आजकल मिनिस्टर है वो सरकार में अच्छा खासा.

डॉ. हर्षमणि ने सुनाया..

नदी में आने वाले पानी के प्रवाह का जरिया थी,

सच्ची दुनिया को देखने का नजरिया थी खिड़की.

लक्ष्मण गुप्ता की प्रस्तुति..

दूर तक साथ देता भला कौन है,

हर मुलाकात इक हादसा है यहां,

वक्त की शाख पे फूल फिर हैं खिले,

कोई बिछड़ा किसी को मिला है यहां.

निजाम हसनपुरी की पंक्ति..

हुस्न की जिद है कि हो रोशनी महफिल-महफिल,

इश्क कहता है कि चरागों को बुझाया जाए.

अख्तर अजीज की नज्म..

आईना देखके हैरत में न पडि़ये साहब,

आपमें कुछ नहीं शीशे में बुराई होगी.