कहानी
ट्रेलर में पूरी कहानी है।

रेटिंग : 1.5 स्टार

समीक्षा
बहुत साल पहले एक फिल्म आई थी 'अंतर्द्वंद्व', गजब पिक्चर थी। उस फिल्म को देखकर मुझे पहली बार पता चला था कि पकड़वा या जबरिया भी शादी करवाई जाती है और बिहार में ये प्रथा आज भी प्रचलित है। अगर दहेज नहीं दे सकते तो अपने मन पसंद के लड़के को जबरन पकड़ कर बंदूक की नोक पर शादी करवा दी जाती है। उसी थीम को हल्की फुल्की कॉमेडी फिल्म बनाने की कोशश है जबरिया जोड़ी और यकीन मानिये इतनी रद्दी है फिल्म कि पूछिए मत।

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न तो यह फिल्म मुद्दे को एड्रेस कर पाती है न ही जरा भी बिलीवेबल है। नकली आर्ट डायरेक्शन, नकली कैरेक्टर , उनका नकली रहन सहन और जबरिया तरीके से बुलवाई है बिहारी हिंदी। बकलोली से भरे हुए बे सर पैर के सीन एक के बाद आते हैं और बोर करके चले जाते है। बाद में रह जाता है थका हुआ मन जो जबरन हॉल से निकलने की जिद करता है और बैकग्राउंड म्यूजिक बहुत ही बकवास हैं।

अदाकारी
सिद्धार्थ मल्होत्रा के मुँह से डायलॉग ऐसे निकलते हैं जैसे उनसे जबरिया गनपॉइंट पर बुलवाया जा रहा है, वो काम में अनबेलिवेबल हैं लेकिन इस रोल में टोटली मिसफिट हैं। परिणीति बहुत ही थकी हुई और बोर साउंड करती हैं। संजय मिश्रा के हाथों में जो आता है वो हमेशा की तरह उसे अच्छे से निभाते हैं। जावेद जाफरी का काम अच्छा है।

बहुत ही नकली फिल्म है जिसका निर्देशन और लेखन दिशाविहीन है। जबरिया भी अगर कोई ले जाये तो मत जाइए, मायूस होंगे।

Review by: Yohaann Bhaargava

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