रांची(ब्यूरो)। हमारे सभी त्योहार हमारी जीवन यात्रा से जुड़े हुए हैं, ये हमारे ही दिव्य परिवर्तन की यादगार हैं। ये बातें प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के स्थानीय सेवा केन्द्र चौधरी बगान, हरम रोड़ में राजयोगिनी ब्रह्मकमारी निर्मला ने कहीं। भारत त्योहारों की भूमि है, जिसमें होली के त्योहार का एक विशेष महत्व है। होली का त्योहार हम सभी बड़ी खुशी के साथ मनाते हैं। होलिका दहन करते हैं, एक दूसरे को बड़े प्यार से रंग लगाते हैं। ये त्योहार ऐसे ही नहीं मनाते हैं बल्कि इसके पीछे आध्यात्मिक महीन रहस्य छिपे हुए हैं। उन्होंने कहा इस घोर कलियुग के बाद सतयुग लाना किसी भी साधारण आत्मा का काम नहीं है और इसी लिए ऐसे समय में कल्प के अंत में निराकार परमात्मा शिव स्वयं इस धरा पर अवतरित होते हैं सतयुग की स्थापना के लिए। परमात्म आवरण समय से लेकर सतयुग की शुरूआत के समय को संगमयुग कहते हैं। हमारे सभी त्योहार वर्तमान समय की यादगार है जब हम परमात्मा से सीधा संबंध जोड़कर अपने जीवन को सुखमय बनाते हैं और सष्टि पर स्वर्ग निर्माण में अपना योगदान देकर फिर से स्वर्ग के मालिक बनते हैं।
क्यों मनाते हैं होली
आगे उन्होंने कहा वास्तव में परमात्मा का धरती पर अवतरित होना और हिरण्यकश्यप (विकारों का प्रतीक) का वध कर प्रहलाद (पवित्रता का प्रतीक) की रक्षा करना ही वह महाघटना है, जिसकी याद में यह त्योहार मनाया जाता है। कल्प के अंतिम युग कलियुग और कलियुग के भी अंतिम चरण में धर्म की अति ग्लानि हो जाती है और हिरण्यकश्यप जैसे लोगों का ही बहुमत हो जाता है। राज्य कारोबार भी उनके हाथों में ही आ जाता है। वे लोग परमात्मा से बेमुख होकर उनकी मत के विपरीत आचरण करते हुए मनमानी करते हैं। परमात्मा के मार्ग पर चलने वालों पर अत्याचार होते हैं, कलंक लगते हैं, उन्हें सहयोग नहीं मिलता है। ये अल्पमत में होते हैं। प्रहलाद ऐसे ही लोगों का प्रतिनिधित्वच करता है। प्रहलाद का अर्थ है वह पहला व्यक्ति जिसको माध्यम बनाकर परमात्मा पिता सबको अहलादित करते हैं। इस कर्तव्य की पूर्ति के लिए परमात्मा पिता गुप्त रूप में धरती पर अवतरित होते हैं। होलिका रूपी विकारों की अग्नि से बचाने के लिए योग अर्थात ईश्वरीय स्मृति रूपी चादर (कवच) देते हैं।