- जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही महिला को नहीं मिली आईसीयू में जगह

- दून हॉस्पिटल ने इलाज करने से किए हाथ खड़े, कहा निजी अस्पताल ले जाओ

DEHRADUN: जिंदगी और मौत से जूझते हुए दून हॉस्पिटल में इलाज के लिए पहुंचने वाले मरीजों की जिंदगी की कोई गारंटी नहीं है. कुछ ऐसा ही मंगलवार को देखने को मिला. बेहतर इलाज की उम्मीद रखे टिहरी से भ् दिन पहले दून अस्पताल में लाई गई सुशीला का इलाज करने से आखिर दून हॉस्पिटल ने अपने हाथ खड़े कर दिए. मजबूर होकर उन्हें निजी अस्पताल का रुख करना पड़ा.

गंभीर हालत में पहुंची थी अस्पताल

सूबे में स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली किसी से छिपी नहीं है और न ही बदहाली का यह आलम सुधरने का नाम ले रहा है. दूर दराज से लोग सस्ता इलाज कराने यहां पहुंचते हैं, लेकिन यहां की बदहाली उन्हें निजी अस्पतालों का रुख करने को मजबूर करती है. दरअसल भ् दिन पहले टिहरी की रहने वाली सुशीला (भ्0) पेड़ से गिरने की वजह से बुरी तरह से घायल हो गयी थी, जिसे गंभीर हालत में परिजन दून अस्पताल लाए. दून अस्पताल में इलाज कर रहे डॉक्टर्स ने मरीज की हालत न सुधरने पर आईसीयू में भर्ती करने को कहा, लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने आईसीयू में बेड न होने की बात कही. बताया गया कि अस्पताल में सिर्फ भ् बेड आईसीयू में हैं, जो फुल हैं. इसके बाद परिजनों को मरीज की हालत बिगड़ने पर मजबूरन एक निजी अस्पताल में ले जाना पड़ा. जिंदगी और मौत से जूझ रही महिला के पति की कुछ साल पहले मौत हो चुकी है, परिवार में सिर्फ बच्चे हैं और आर्थिक स्थिति बेहद खराब. निजी अस्पताल में इलाज कराने की हिम्मत उसमें नहीं है, लेकिन डॉक्टर्स की सलाह पर परिजनों ने मजबूरी में उसे निजी अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा है.

महंगा है निजी अस्पताल

दून अस्पताल में आईसीयू के वर्तमान में भ् बेड हैं, जिनका रोजाना चार्ज करीब क्म्00 रुपए है. जबकि प्राइवेट अस्पताल में आईसीयू का चार्ज क्ख् हजार के करीब है जिसे वहन करना आम आदमी के लिए काफी मुश्किल है. इसी कारण कई लोग बेहतर इलाज पाने से वंचित रह जाते हैं और कई लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ती है.

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अभी आईसीयू में भ् बेड हैं, जो फुल हैं. जैसे ही कोई बेड खाली होता है तो हम तुरंत दूसरे मरीज को बेड दे देते हैं.

डॉ. केके टम्टा, एमएस, दून अस्पताल