Lucknow: 18 जनवरी को एम्स में एडमिट हुई फलक ने 16 मार्च को अपनी जिन्दगी की लड़ाई में हार गई. दो साल की फलक 56 दिन मौत से लड़ती रही. लखनऊ में एक नहीं, कई फलक हैं. कुछ जिंदगी की जंग हार गईं और कुछ लकी थीं लेकिन उनकी सचाई फलक से कम दर्दनाक नहीं है. एम्स में फलक इस हाल में कैसे पहुंची, उसका असली गुनाहगार कौन है? यह एक लम्बी कड़ी है जो अब पुलिस के हाथ है. लेकिन सवाल यह है कि आखिर लड़कियों के साथ इस तरह का व्यवहार कब तक होता रहेगा. कभी कोई लक्ष्मी किसी मासूम को फलक जैसी घातक स्थिति में पहुंचाने का कारण बनती है तो कभी कोई मां ही बेटी से छुटकारा पाना चाहती है.
लखनऊ में भी कई ऐसी मासूम हैं जो जिन्दा हैं क्योंकि उन्हें कोई हाथ समय पर मिल गया वरना उन्हें मारने के लिए तो कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी गई थी. दो महीने पहले करीब ढाई साल की मासूम को गोंडा रेलवे स्टेशन पर एक चाय के होटल के पीछे फेंक दिया गया. वो सात दिन तक गंदगी में पड़ी रही लोग देखते थे और खिसक लेते थे उसकी आंखों में फंगस लगने लगी. सात दिन बाद यह सूचना गोंडा की सीडब्लूसी (चाइल्ड वेलफेयर कमेटी) को दी गई. वहां से इस बच्ची को लखनऊ भेजा गया. यहां डॉक्टर्स ने जब उस बच्ची का चेकअप किया तो उनका यह सवाल था कि क्या यह जिन्दा है और अगर है तो कितनी देर तक?
नहीं थी उसे बचा पाने की उम्मीद
डॉक्टर्स ने इलाज तो शुरू किया, लेकिन यह कह कर कि बस सिर्फ यह 15-20 दिन की मेहमान है. उस बच्ची के दोनों आंखों में फंगल इंफेक्शन, सिर में चोट की वजह से ब्रेन में क्लाटिंग, बॉडी इंफेक्शन और कमजोरी के चलते वो बच्ची बस कंकाल सी नजर आ रही थी. लेकिन शायद ऊपर वाले को कुछ और ही मंजूर था ट्रीटमेंट और वरदान संस्था के राकेश दुबे के प्रयास से बच्ची रिकवर होने गली. डॉक्टर्स की उम्मीद भी जगी. फंगल इंफेक्शन के चलते बच्ची अपनी एक आंख खो चुकी है, लेकिन उसकी जिन्दगी की तरह एक आंख में अभी नूर बाकी है.
कोई कैसे छोड़ सकता है इसको
एक पति ने अपनी बेटी और पत्नी को छोड़ कर दूसरी महिला से नाता जोड़ लिया. कुछ दिनों बाद पत्नी ने भी दूसरे से शादी कर ली और करीब ड़ेढ साल की बेटी को छोड़ कर चल दी. वो मासूम अपने नाना के पास पहुंची तो कुछ दिनों बाद नाना की भी डेथ हो गई. वो बच्ची फिर से अनाथ हो गई. पड़ोसियों के पास कुछ दिन रहने के बाद आजमगढ़ सीडब्ल्यूसी के थ्रू वह बच्ची भी लखनऊ के एडाप्शन सेंटर में आई. जब वो यहां आई थी तो उसके हाथ में भी एक फ्रेक्चर था. उसका नाम नेहा रखा गया है और जिसने भी उसे देखा वो उसकी मुस्कान को देखकर यही कहता है कि इतनी प्यारी बेटी को कोई कैसे छोड़ कर जा सकता है. उसके अपनों के होते हुए वो दूसरे के घर के आंगन में पलेगी, लेकिन सुकून यह है कि वो अब सुरक्षित हाथ में होगी.
 इन फूलों का कौन है माली
वार्मर में लेटी हुई करीब 8 महीने की हंसा सोते-सोते उठती है और पीठ और घुटनों के बल वो वार्मर में ही इस तरह से हिलती है मानों एक्सरसाइज कर रही हो. कोई उसे देखकर हंसता है तो वो भी खिलखिला उठती है. चमकीली आंखें, बस हल्की सी पुचकार पर खिलखिलाती हुई हंसी. यह बच्ची उन्नाव में नदी के किनारे फेंकी गई थी जो अब लखनऊ के वरदान एडाप्शन सेंटर में रह रही है. गंदगी, बीमारी के साथ यह बच्ची न जाने कितने घंटे बालू में पड़ी रही. एडॉप्शन सेंटर में एक मासूम ऐसी भी है जिसे देखकर शायद कोई नहीं कह सकता कि यह मासूम एचआईवी पॉजिटिव और हेपेटाइटिस बी का शिकार है. फलक को तो मरने से पहले उसकी मां मिल गई थी, लेकिन इन बच्चों का क्या जो मौत के मुंह से निकल कर जिन्दगी की राह पर चल तो पड़े हैं, लेकिन वो किस बगिया के फूल हैं किसी को नहीं पता.
उन्हें मरने के लिए ही छोड़ा था
वरदान एडाप्शन सेंटर में 2011-12 में 11 ऐसी लड़कियां आईं जिन्हें बुरी गत के साथ फेंका गया. उनके अपने भी उन्हें मौत के मुंह में धकेलने से नहीं कतराए, लेकिन उन्हें छोड़ा मरने के लिए ही था. वहीं चाइल्ड हेल्प लाइन के अनुसार 2011-12 में 10 लड़कियों को छोड़ा गया न्यू बॉर्न से एक साल के बीच की इन बच्चियों में दो बच्चियां ऐसी मिली थी जिनके बारे में आज भी कोई नहीं भूला. करीब 5 महीने पहले सदर आर्मी पब्लिक स्कूल के आगे सुमेश्वर हनुमान मंदिर के पास नवजात बच्ची को इस तरह से फेंका गया कि उसको अंदरूनी चोट आई. जिसने देखा यही कहा कि बच्ची की कंडीशन काफी खराब है. बच्ची को सीडब्ल्यूसी के आदेश पर एडाप्शन सेंटर के सुपुर्द किया गया. बच्ची की हालत खराब थी सो उसे एडमिट कराया गया, जहां करीब एक वीक बाद उसकी मौत हो गई. वहीं करीब 8 महीने की बच्ची बाराबंकी के रेलवे स्टेशन पर खड़ी एक ट्रेन के कम्पार्टमेंट में रोती हुई मिली थी. उसे मारने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, लेकिन वो आज एक होम में रह रही है.
वरदान एडाप्शन सेंटर के फाउंडर राकेश दुबे जो इस वक्त बीमार बच्चियों की देखरेख कर रहे हैं ने बताया कि लोग बस हत्या नहीं पाते वरना कई बार बच्चियां इस कंडीशन में आती हैं कि उन्हें बचाना डॉक्टर्स के लिए भी मुश्किल काम होता है. हमारे पास भी हर साल की तरह इस बार भी लड़कियां ही ज्यादा आई हैं. लड़के वही छोड़े जाते हैं जो बीमार होते हैं.
दिल्ली साउथ जोन सीडब्ल्यूसी के चेयरपर्सन ने बताया कि फलक तो अब इस दुनिया में नहीं रही, लेकिन हम उसके भाई बहन जो इस वक्त अपनी मां के साथ नारी निकेतन में रह रहे हैं उनके रिहैबिलिटेशन के लिए प्रयासरत है. जहां तक सवाल एबैंडेंट चाइल्ड का हैं तो हर साल  0 से 6 साल की उम्र के दो सौ से ढाई सौ के आस पास बच्चों को छोड़ा जाता है और उसमें 70 परसेंट गर्ल चाइल्ड होते हैं.

Reported By: Zeba Hasan