इंडियन अराइवल डे पुरखे माॅरिशस पहुंचे गुलाम बनकर वंशज बन गए राष्‍ट्रपतिप्रधानमंत्री

2018-11-02T13:35:58Z

1834 में एटलस नाम का जहाज यूपी आैर बिहार से मजदूरों को लेकर माॅरिशस पहुंचा था। ये मजदूर वहां दास बनाकर रखे गए थे आैर उनसे गन्ने की खेती करार्इ जा रहीथी। उन्हें 1835 में दास प्रथा से मुक्ति मिली। जहां वे रहते थे उस जगह को अप्रवासी घाट कहा जाता है एेसे दो स्थान रहने के कमरे आैर रसोर्इ अब यूनेस्को की धरोहर हैं।

कानपुर। आज ही के दिन यानी कि 2 नवंबर को 1834 में एटलस नाम का जहाज यूपी आैर बिहार से मजदूरों को लेकर माॅरिशस पहुंचा था। बाद में इन्हीं मजदूरों की आने वाली पीढ़ियों ने देश में एक बड़ा मुकाम हासिल किया। माॅरिशस के वर्तमान प्रधानमंत्री परविंद जुगनॉथ हैं और ये उसी परिवार का हिस्सा हैं, जिनके पूर्वज मॉरीशस में कभी मजदूरी किया करते थे। हालांकि, सिर्फ परविंद ही नहीं मॉरीशस में ऐसे कई व्यक्ति हैं, जिनके परिवार वाले मजदूरी किया करते थे और आज वे देश के खास व्यक्तित्व में शामिल हैं। मॉरिशस में यूपी आैर बिहार वालों की कहानी आधुनिक माॅरिशस के इतिहास को गंभीरता से हाइलाइट करती है । यह बताती है कि हमारे देशवाशियों को माॅरिशस में काफी संघर्षों का सामना करना पड़ा है। यूपी आैर बिहार के मजदूरों को अंग्रेज बहला फुसलाकर माॅरिशस ले गए थे, भारतीयों से कहा गया कि वे काम करने के लिए उत्तर भारत में ले जाए जा रहे हैं लेकिन वे माॅरिशस पहुंच गए और बाद में वहां उन्होंने मजदूरों को दास बनाकर रखा आैर उनसे गन्ने की खेती करार्इ।
गए थे इतने मजदूर

कहा जाता है कि अंग्रेज उन दिनों मजदूरी करवाने के लिए भारत से करीब 4 लाख 62 हजार से अधिक लोगों को माॅरिशस ले गए थे। इसमें पुरुष, महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। अंग्रेज जहां उन मजदूरों को रखते थे उस जगह को अब अप्रवासी घाट कहा जाता है। बता दें कि माॅरिशस दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जहां यूनेस्को के दो विश्व धरोवर हैं। एक 'ले मोर्ने' नाम का जगह दास प्रथा के विरोध पर समर्पित है और दूसरा, जहाँ अंग्रेजों ने मजदूरों को दास बनाकर रखा था, उसे यूनेस्को ने अपना धरोवर घोषित किया है।

कॉट्रैक्ट पर काम के लिए रखा

बाद में यानी कि 1835 में काफी विरोधों के बाद माॅरिशस में दास प्रथा समाप्त हुई, जिसके बाद मजदूरों को कॉन्ट्रैक्ट पर काम के लिए रखा गया। 2014 में माॅरिशस मे इंडियन इंडियन अराइवल डे की 180वीं एनिवर्सरी मनाई गई थी। इसके एक साल पहले ही भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी माॅरिशस के दौरे पर गए थे।



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