पॉलिटीशियंस को आईना दिखाता है 'जेड प्‍लस' का असलम पंचरवाला

2014-11-27T17:30:40Z

राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार से सम्‍मानित डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी महज एक डायरेक्‍टर नहीं है बल्कि समाज के अनछुये पहलुओं को सिनेमा के माध्‍यम से प्रस्‍तुत करने वाले एक रचनाकार हैं चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्‍में समाज के प्रत्‍येक वर्ग को वह आईना दिखाती हैं जिसे वह नजरअंदाज करते रहते हैं इसी फेरहिस्‍त में उनकी नई फिल्‍म 'जेड प्‍लस' भी जुड़ गई है जोकि 28 नवंबर को रिलीज हो रही है तो आइये जानते हैं आखिर 'जेड प्‍लस' फिल्‍म समाज को क्‍या संदेश देती है

आम आदमी की कहानी
समाज में अगर हम आम आदमी की बात करते हैं, तो हमारा ध्यान सबसे पहले उन लोगों के पास जाता है जिनसे हम अक्सर मिलते हैं. जैसे कि दूधवाला, रिक्शावाला, पंचरवाला या फिर फेरीवाला. हम इन लोगों को आम आदमी तो कहते हैं, लेकिन आपने कभी यह सोचा है कि अगर ये आम इंसान न हों, तो आपके सभी काम कौन करेगा? यह सवाल सुनने में तो जरूर अटपटा लगता हो, लेकिन चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने इसी सब्जेक्ट को अपनी फिल्म के लिये चुना. चंद्रप्रकाश द्विवेदी की यह 'जेड प्लस' फिल्म भी एक आम इंसान असलम पंचरवाले की है.
Director : Chandra Prakash Dwivedi
Cast : Adil Hussain, Mona Singh, Mukesh Tiwari, Sanjay Mishra, Kulbhushan Kharbanda
Producer : Mukund Purohit

जेड प्लस सिक्योरिटी का असली हकदार कौन?
'जेड प्लस' की कहानी फतेहपुर के असलम पंचरवाले की कहानी है. उसकी फतेहपुर में पंचर की एक छोटी सी दुकान है. इस दौरान किसी कारणवश उसे पीएम से मिलने का मौका मिल जाता है. पीएम से मुलाकात के दौरान वह अपनी कुछ परेशानियों को उनके सामने जाहिर करता है, जिसके बाद उसे जेड प्लस सिक्योरिटी मिल जाती है. इस फिल्म में चंद्रप्रकाश ने एक गरीब इंसान के जीवन को इस कदर जीवंत किया है, जिसे देखकर शायद आपकी सोच बदल जाये. हालांकि फिल्म को देखते हुये आपके दिमाग में यह सवाल कई बार आयेगा कि 'जेड प्लस की सिक्योरिटी का असली हकदार आखिर कौन है'. यह फिल्म आम वर्सेज खास की कहानी है. इस फिल्म को देखते हुये समाज का खास वर्ग भी कुछ सवालों को ढ़ूढने में लग जायेगा.
कम बजट में संजीदगी कॉमेडी
चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने दर्शकों का मनोरंजन करने के लिये इस फिल्म में कॉमेडी का तड़का लगाया है. इसकी एक झलक आपने फिल्म के फर्स्ट लुक पोस्टर में देखी होगी, जिसमें लीड एक्टर आदिल हुसैन बहुत सारे सिक्योरिटी पर्सन्स के साथ लोटा लेकर आगे चल रहे हैं. अगर एक तरीके से देखा जाये तो यह पॉलिटिकल सटायर के रूप में आपके सामने आ रही है. फिल्म डायरेक्टर चंद्रप्रकाश का सीधे तौर पर कहना है कि मसाला  फिल्मों में 100 करोड़ फूंकने से फायदा क्या है. जबकि छोटे बजट में सार्थक फिल्में बन सकती हैं. अब अगर आप यह देखने के लिये एक्साइटेड हैं कि एक पंचरवाला देश के माननीयों को कैसे आईना दिखाता है, तो यह फिल्म आपको जरूर देखनी चाहिये.

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