वो दो घंटे लखनऊ से फरमान आयाजिंदा

2014-08-21T07:00:32Z

मुखबिरी की शर्त थी, मारना होगा

जिंदा बचने के लिए प्लान बी था उसका पास

KANPUR: सटीक मुखबिरी पर पकड़ में आया ये शातिर एसटीएफ की बड़ी मछली थी। मुखबिरी की शर्त भी यही थी मोनू पहाड़ी मिल तो जाएगा, लेकिन जिंदा नहीं बचना चाहिए। आउट आफ टर्न प्रमोशन बंद होने के बाद से पुलिस की बंदूकें बहुत दिन से खामोश हैं। लेकिन तीन साल से पुलिस के लिए पहेली बने मोनू के शिकंजे में आने के लिए एसटीएफ को ये शर्त मंजूर थी। तय हो गया था कि मोनू के नाम की बुलेट कहां चलेगी, कब चलेगी। लेकिन उन दो घंटे के दौरान ऐसा बहुत कुछ हुआ कि मोनू जिंदा है, जेल से अपनी सल्तनत चलाएगा।

तैयार था प्लान बी

मोनू को अपने बाकी हमपेशाओं की तरह इस बात का बखूबी अहसास था कि किसी भी दिन वह पुलिस की संगीन के सामने होगा। इसके लिए उसका प्लान बी तैयार था। इस प्लान बी के तहत मोनू के परिवार और हमदर्दो के पास एसएसपी से लेकर डीजीपी तक और मानवाधिकार आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के फैकस नंबर थे, ईमेल आईडी थे। दो वकीलों को भी ये जिम्मेदारी दी गई थी कि एक इशारे पर दिल्ली से लेकर लखनऊ तक एनकाउंटर का शोर मचना चाहिए। मोनू जो छिपने का ठिकाना चुनता था, वो उसके बेहद भरोसेमंद लोग थे। उन्हें पता था कि मोनू अगर पुलिस के हाथ लगता है, तो उसे किसे और कहां खबर पहुंचानी है। इसमें एक सबसे अहम पहलू मीडिया का इस्तेमाल था। मोनू के खास लोगों को पता था कि मीडिया के पास उसके उठाए जाने की खबर कैसे पहुंचानी हैं। और ये भी पता था कि कैसे ये खबर जंगल में आग की तरह फैलेगी और पुलिस के लिए एनकाउंटर नामुमकिन हो जाएगा।

जरा सी चूक

एसटीएफ ने मोनू को घेरने के लिए फूलप्रूफ प्लान बनाया। छिपने के ठिकाने की निशानदेही, राहदारी तक सारी एक्सरसाइज रात में ही कर ली गई थी। भागने के रास्तों पर भी पुलिस का पहरा था। प्लान के मुताबिक मोनू को दबोचने में भी पुलिस कामयाब रही। लेकिन मोनू को उठाकर ले जाने की जल्दी पुलिस के सर पर सवार थी। एक इनपुट ये भी था कि मोनू के खास लोग उसके दबोचे जाने की सूरत में बवाल करा सकते हैं। ऐसे में पुलिस ने निगरानी के लिए तैनात मोनू के गुर्गे और छिपने का ठिकाना मुहैया कराने वाले कबाड़ी को काबू में नहीं किया। कबाड़ी ने मोनू के पुलिस में गिरफ्त में जाते ही उसके प्लान बी के तहत एक्शन शुरू किया। बात वकीलों से लेकर मीडिया तक पलक झपकते ही पहुंच गई। इस हद तक कि कौन से रंग के कपड़े पहने है, पांव में चप्पल हैं, पुलिस द्वारा उठाने के गवाह कौन-कौन हैं।

वही हुआ जो मोनू ने चाहा

मीडिया तक जैसे ही मोनू के पुलिस के हाथ लगने की सूचना लगी (या पहुंचाई गई) तत्काल अफसरों के फोन बजने लगे। कानपुर से लखनऊ तक ये तस्दीक करने की कोशिश भी शुरू हो गई कि एनकाउंटर कहां हो रहा है। बाराबंकी रोड पर किसी लोकेशन तक की सूचना मीडिया को मिल गई। जब आला अफसरों तक को ये क्लीयर हो गया कि मोनू को उठाने की बात अब ढकी-छिपी नहीं रह गई है, तो एनकाउंटर के मसले पर दोबारा विचार शुरू हुआ। एसटीएफ टीम दो खेमों में बंटी थी। एक खेमा चाहता था कि मुखबिर के साथ किया वादा निभाया जाए। नहीं तो वो मारा जाएगा। दूसरा खेमा बिना बात आफत मोल नहीं लेना चाहता था। दो घंटे तक एसटीएफ टीम मोनू को दबोचे ग्रीन सिग्नल का इंतजार करती रही। आखिरकार लखनऊ से फोन आया। एनकाउंटर नहीं होगा। एसटीएफ ने मोनू को नौबस्ता थाने में जमा करा दिया। इस हायतौबा में मोनू की लिखापढ़ी भी रात को ही कर दी गई। नहीं तो अमूमन ऐसे शातिर के हाथ लगने पर दो-तीन दिन तो उससे बिना लिखा-पढ़ी के ही पुलिस के सवालों के जवाब देने होते हैं।


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