फिल्म इंडस्ट्री में चेहरे को लेकर होता है भेदभाव, मणिपुर के एक्टर को बुलाते हैं 'चाइनीज'

Updated Date: Thu, 16 Jul 2020 01:54 PM (IST)

दुनिया भर में जहां रंगभेद को लेकर ब्लैक लाइव्स मैटर कैंपेन चल रहा है तो भारत में नाॅर्थ ईस्ट से आने वाले एक्टर्स को नस्लवाद का शिकार होना पड़ता है। ऐसे ही एक अभिनेता हैं लुकराम स्मिल जिन्होंने अपने अनुभव साझा किए।

मुंबई (आईएएनएस)। मणिपुर से आने वाले अभिनेता लुकराम स्मिल डिजिटल फिल्म "पेनाल्टी" में नायक की भूमिका निभा रहे हैं। उनका कहना है कि फिल्म इंडस्ट्री में उनके जैसे लोगों को रोल मिलना आसान नहीं होता। इसकी वजह उनकी एक्टिंग नहीं चेहरा है। लुकराम नाॅर्थ ईस्ट से आते हैं ऐसे में उनका चेहरा चाइनीज जैसा लगता है। बस यही कहकर कास्टिंग डायरेक्टर उन्हें चाइनीज या नेपाली रोल के लिए कास्ट करते हैं। लुकराम चाहते हैं, ये भेदभाव खत्म हो।

चिंकी एक्टर कहकर बुलाते थे लोग
लुकराम कहते हैं कि कास्टिंग निर्देशकों ने उन्हें "एशियाई लुक वाला अभिनेता" कहना शुरु कर दिया है मगर पहले वो 'चिंकी' या 'चाइनीज लुकिंग' कहते थे। एक्टर का कहना है, "मुझे लगता है कि सोशल मीडिया सक्रियता ने कम से कम बातचीत शुरू कर दी है। एक साल पहले तक, मैं कहूंगा कि पूर्वोत्तर से हमारे जैसे लोगों को कास्टिंग कॉल इसलिए मिलते थे, क्योंकि काॅस्टिंग डायरेक्टर्स को चाइनीज या नेपाली जैसे दिखने वाले कैरेक्टर की तलाश होती थी।' लुकराम की शिकायत है कि लोग उन्हें इंडियन क्यों नहीं मानते, या वैसे रोल क्यों नहीं देते। नस्लवाद हमारे समाज में लोगों के दिमाग में इस हद तक अंतर्निहित है कि वे हमारे 'रूप' को 'भारतीय' रूप में भी नहीं गिनते हैं!

अब कहते हैं एशियन फीचर्स वाला एक्टर
एक्टर का कहना है, 'मेरे जैसे जिन कलाकारों ने इसका सामना किया है वे समझेंगे कि यह कितना अपमानजनक लगता है। यह कहते हुए कि, हालिया कास्टिंग कॉल में हमने एक बदलाव देखा है। अब हमें 'एशियन फीचर्स', 'नॉर्थईस्टर्न' वाला एक्टर्स कहा जाता है। मुझे लगता है कि यह अभी भी हमें 'नेपाली', 'चाइनीज' और 'चिंकी' कहकर पुकारने से बेहतर है। शुभम सिंह द्वारा निर्देशित, 'पेनाल्टी' नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो रही है। इसमें लुकराम के अलावा के के मेनन, शशांक अरोड़ा, मनजोत सिंह और बिजौ थंगजाम हैं।

कैसे आए फिल्मों में
लुकराम से पूछा गया कि क्या वह हमेशा एक अभिनेता बनना चाहते हैं?" उन्होंने जवाब दिया, 'नहीं, मैं स्वभाव से बहुत शर्मीला हूं और जब मैं इंफाल से बाहर निकला और अपने हायर एजुकेशन के लिए लखनऊ गया तो मेरा सामना जातिवाद से होने लगा। मेरा आत्मविश्वास कम होता गया। लेकिन मुझे बीजू का शुक्रिया अदा करना चाहिए, जिन्होंने मुझसे कहा कि मैं खुद को सीमित न रखूं और सपनों के शहर मुंबई आकर पता लगाऊं।' नस्लवाद के कारण उनके संघर्ष के बाद, लुकराम को अभी भी बॉलीवुड में करियर बनाने की उम्मीद है? इस पर लुकराम ने हालिया फिल्म "एक्सोन" का उदाहरण देते हुए कहा: "इस तरह की फिल्म के साथ, हम एक सकारात्मक प्रकाश प्राप्त कर रहे हैं, नस्लवाद के आसपास सही बातचीत पर्याप्त है। निरंतर भेदभाव जो कई वर्गों का सामना करते हैं और जिन रूढ़ियों का हम शिकार हैं, उन्हें रोकना चाहिए, और फिल्म ऐसा कर सकती है।'

Posted By: Abhishek Kumar Tiwari
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