बस्ते के बोझ तले सिसकता बचपन

2019-07-20T06:00:53Z

-कही पैरेंट्स नहीं अवेयर तो कही स्कूल कर रहे मनमानी

-बस्ते के बोझ की वजह से बीमारी के शिकार भी हो रहे बच्चे

शिक्षा के निजीकरण के दौर में स्कूली बस्ते का बोझ इतना बढ़ गया है कि इसके बोझ तले बचपन ही दब गया है।

ऐसे बहुत कम ही स्कूल ऐसे है जहां बच्चों के पीठ पर बस्ते का बोझ नहीं डाला गया है। नियम यह है कि किसी भी बच्चें के पीठ पर उसके कुल वजन का 10 फीसदी वजन ही उसके बैग का होना चाहिए लेकिन ज्यादातर स्कूलों ने इस नियम को दरकिनार कर रखा है। दैनिक जागरण आई नेक्स्ट में पब्लिश हुई रिपोर्ट में बताया गया है कि बच्चों के पीठ पर कितना बोझ है। चलिए जानते है क्या सोचते है पैरेंट्स और स्कूल प्रिंसिपल इस बारे में।

स्कूल की गलती है भारी बस्ता

खुद को दूसरों से अलग और बेहतर दिखाने के चक्कर में स्कूल सेलेबस में ज्यादा किताबें और कापियां बढ़ा रहे हैं। जिसकी वजह से बच्चों का बस्ता भारी होता जा रहा है। सरकार ने तो समय-समय पर इस बारे में बार गाइडलाइन जारी की हैं, लेकिन स्कूल उसे खास तवज्जो नहीं देते हैं।

सरकार भी है चिंता में

बच्चों के बस्ते के बोझ को लेकर सरकार खुद भी चिंतित है। इसलिए एनसीआरटी ने फरमान जारी कर कहा है कि कक्षा दो तक के लिए दो किताबें (लैंग्वेज और मैथ्स) और कक्षा पांच तक के लिए तीन किताबें (लैंगवेज, एनवायरमेंटल स्टडी और मैथ्स) ही स्कूल रखें। लेकिन बहुत ही कम ऐसे स्कूल है जो इस नियम का पालन कर रहे हैं।

वेबसाइट पर भी हैं बुक्स

एनसीआरटी ने सभी किताबें ई-पाठशाला की बेवसाइट पर भी उपलब्ध करा रखी है ताकि छात्र-छात्राओं को स्कूलों में हर विषय की किताब ले जाने की परेशानी से छुटकारा मिल सके। स्कूल भी चाहें तो प्रिंटिटेड बुक्स की बजाय ई बुक से भी पढ़ाई करा सकते हैं। इससे पैरेंट्स के किताबों को खरीदने का खर्च भी कम हो जाएगा। लेकिन स्कूल ऐसा कर नहीं रहे हैं।

सीबीएसीई ने दी थी सलाह

2017 में सीबीएसीई ने अपने हर स्कूल को कक्षा दो तक स्कूल बैग नहीं लाने की सलाह दी थी। साथ ही इससे ऊपर की क्लास में भी बस्ते के बोझ को कम से कम रखने की नसीहत भी दी थी। शिक्षा के निजीकरण के दौर में ये सब आदेश हवा में उड़ रहे हैं।

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क्या कहते है पैरेंट्स

स्कूल की मनमानी की वजह से बच्चों का बचपन खराब हो रहा है। कई बार शिकायत के बाद भी बस्ते का वजन कम नहीं किया जा रहा।

-वंदना जायसवाल, चेतगंज

मेरे बेटी का वजन करीब 25 किग्रा है, लेकिन उसके बैग का वजन 6 किग्रा से ज्यादा है। इसकी वजह से वह बैग पीठ पर नहीं रख पाती।

-प्रियंका दूबे, मड़ौली

स्कूलों की मनमानी के खिलाफ केन्द्र के साथ प्रदेश सरकार को भी सख्त दिशा निर्देश जारी करना चाहिए। भारी बस्ता की वजह से बच्चा बीमार होगा।

-ज्योति वर्मा, पहडि़या

मेरे घर के तीन बच्चे अलग-अलग स्कूलों में पढ़ने जाते है, लेकिन कोई भी स्कूल ऐसा नहीं है जहां बच्चों को कम किताबें लेकर जानी पड़े।

-रागिनी शर्मा, पियरी

सिर्फ फरमान जारी कर देने से काम नहीं होने वाला है। इसके लिए सरकार को गंभीर भी होना होगा। तभी स्कूलों की मनमानी रुकेगी।

सुमन सिंह, कंदवा

क्या कहते है स्कूल के प्रिंसिपल

हम अपने स्कूल में सीबीएसई गाइडलाइन और उसके निमयों के मुताबिक ही बच्चों से किताबें स्कूल लाने को कहते हैं। उनके बैग का वजन 2 किग्रा किग्रा से ज्यादा नहीं है।

दिलीप मिश्रा, प्रिंसिपल, ग्लेनहिल स्कूल

हाई-फाई स्कूल बनाने के चक्कर में ज्यादातर स्कूल बच्चों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रहे हैं। पब्लिशर्स के मिलीभगत कर स्कूल संचालक बच्चों के बैग का बोझ बढ़ा रहे हैं।

अविनाश चंद्र, प्रिंसिपल, संत साई शिक्षण संस्थान

हमारे स्कूल में क्लास 2 से 5 तक के बच्चों के बैग का वजन 2 किग्रा से ज्यादा नहीं है। उनसे सेलेबस के हिसाब से ही बुक्स मंगाए जाते हैं ताकि उन पर बोझ न पड़े। इसके लिए पैरेंट्स को भी ध्यान देने की जरूरत है।

विनोद पांडेय, प्रिंसिपल, हैपी मॉडल स्कूल, कुरहुआ

मैनेजमेंट ने बच्चों के बैग को ओवरवेट न करने का सख्त निर्देश दिया है। बच्चों के बैग्स की डेली मॉनिटरिंग होती है। इसके लिए क्लास टीचर्स को भी निर्देश दिया गया है।

गौरी, प्रिंसिपल, डालिम्स सनबीम, सिगरा

दिल्ली पब्लिक स्कूल एक ब्रांड है, इसलिए हम कभी भी बच्चों के बैग को ओवरवेट नहीं करते। कुछ किताबें स्कूल में रखते हैं। दो सब्जेक्ट का ही होमवर्क देते हैं ताकि बच्चों पर बोझ न बढ़े।

सुनिल सिंह रावत, प्रिंसिपल डीपीएस काशी

हमारा पूरा प्रयास रहता है कि बच्चों के बैग का वजन ना बढ़े, लेकिन कई बार बच्चों के पैरेंट्स उनके बैग में सभी बुक्स रख देते हैं। इसलिए उन्हें पैरेंट्स को बुलाकर वापस भेजा जाता है। यहां उनमें अवेयरनेस की कमी भी है।

पल्लवी तोलानी, प्रिंसिपल, हैप्पी मॉडल, रामकटोरा


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