डिमांड से टूट रही 'सात फेरों की कसम'

2019-11-14T05:46:19Z

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केसेज महिला उत्पीड़न के दर्ज हुए हैं 2018 में

887

केसेज महिला उत्पीड़न के दर्ज हुए इस साल अक्टूबर तक

45

महिलाओं की इस साल अक्टूबर तक हुई दहेज हत्या

-उत्पीड़न किए जाने से ससुराल में सुबक रहीं सैकड़ों महिलाएं, थाने पहुंच दर्ज कराई रिपोर्ट

-तीन दर्जन से भी अधिक महिलाओं की दहेज के लिए अक्टूबर तक की जा चुकी है हत्या

PRAYAGRAJ: सात फेरों के वक्त सात जन्म तक साथ निभाने की कसमें भी ससुराल में सितम से बचा नहीं पा रही हैं। आलम यह है कि महिलाओं का सबसे ज्यादा उत्पीड़न दहेज को लेकर किए जा रहे हैं। विभिन्न थानों में दर्ज मुकदमों में लगाए गए आरोप इस बात के जिंदा सुबूत हैं। सिर्फ उत्पीड़न ही नहीं ससुराल में महिलाओं की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। इस साल जनवरी से 31 अक्टूबर तक ससुरालियों द्वारा करीब चार दर्जन महिलाओं की हत्या तक की जा चुकी है। सिर्फ इतना ही नहीं, तमाम महिलाएं ऐसी भी हैं, जिनका उत्पीड़न हो रहा है, लेकिन वह अपनी शिकायत थाने तक नहीं पहुंचा पा रही हैं।

जागरुकता भी बेअसर

वुमन सिक्योरिटी और अवेयरनेस को लेकर गवर्नमेंट तमाम कैंपेन चला रही है। लेकिन ग्राउंड लेवल पर इनका सक्सेस रेट काफी कम है। बेटियों को सरकारें तवज्जो भले दे रही हों। लेकिन शादी के बाद ससुराल में तमाम बेटियों की जिंदगी नारकीय हो चुकी है। दहेज में लाखों रुपए लिए जाने के बावजूद ससुरालियों की भूख मिटने का नाम नहीं ले रही। तमाम ऐसे केसेज हैं, जहां रुपए और लग्जरी गाड़ी की एक्स्ट्रा डिमांड हो रही है।

पति भी नहीं कर रहे प्रोटेक्ट

डिमांड पूरी न होने पर ससुराल के लोग महिलाओं को प्रताडि़त करने से बाज नहीं आ रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि ऐसे कई मामले हैं, जिनमें पति के भी शामिल होने की बात सामने आई है। दहेज को लेकर सताई जाने वाली 887 महिलाएं इस साल अक्टूबर तक रिपोर्ट दर्ज करा चुकी हैं। इतना ही नहीं दहेज लोभी ससुरालियों द्वारा 45 महिलाओं की हत्या तक की जा चुकी है। इन मामलों में रिपोर्ट दर्ज कर पुलिस मामले की विवेचना में जुटी हुई है।

क्या कहते हैं समाज शास्त्री

-भारतीय संस्कृति पर हावी होती आधुनिकता दहेज जैसी कुप्रथा का जन्मदाता है।

-भारतीय कानून व्यवस्था में दहेज लेना व देना दोनों ही अपराध की श्रेणी में माना गया है।

-इसके बावजूद सामाजिक स्वीकृति की वजह से यह अपराध समाज के बीच फल-फूल रहा है।

-दहेज जैसी कुप्रथा को समाप्त करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ समाज के हर वर्ग को आगे आना होगा।

-समाज में यह चेतना जगाने की जरूरत है कि कुल यानी वंश का संचालन बहुओं यानी बेटियों से ही होता।

-बावजूद इसके वंश को बढ़ाने वाली बहू को ही सताया जाना या उसे मार देना समाज ही नहीं कानून भी अपराध है।

-रिश्ते व विश्वास का व्यापार बढ़ता जा रहा है। दिखावा संस्कृति के बढ़ते चलन की वजह से भी दहेज प्रथा बढ़ रही है।

-इसे मानसिक विकृति भी कही जा सकती है, जिसका इलाज सामाजिक व मानसिक चेतना से ही संभव है।

दहेज जैसी कुप्रथा बढ़ने के कई कारण हैं। इसे सामाजिक मान्यता मिल चुकी है। सर्वसमाज ही मिलकर इसे खत्म भी कर सकता है। बशर्ते इसके लिए प्रबल इच्छाशक्ति के साथ आगे आना होगा।

-डॉ। हेमलता श्रीवास्तव, समाजशास्त्री

उत्पीड़न की शिकार महिलाओं को इंसाफ मिले इसके लिए रिपोर्ट दर्ज कर विवेचनाएं की जा रही हैं। परिवार परामर्श केंद्र में सुलह समझौते के आधार पर भी मसले को हल कराए जाने की कोशिश की जाती है। महिला थाने में भी दोनों पक्ष की काउंसलिंग कराई जाती है।

-सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज, एसएसपी प्रयागराज

Posted By: Inextlive

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