यहां सांप्रदायिक सौहार्द की दिखती है झलक

2018-06-27T06:00:36Z

- एक साथ होती है पूजा और आजान

- कुछ ही दूरी पर मौजूद है मस्जिद और मंदिर

हिंदू कहो तो मैं नहीं, मुसलमान भी नाहि। पांच तत्व का पूतला, गैवी खैलै माहि।।

GORAKHPUR: कबीर न हिंदू थे और न मुसलमान, वह थे सच्चे इंसान। संत कबीर का यह मशहूर दोहा और उनके बारे में कहे यह शब्द उनकी यादों के साथ भी जुड़े हैं। मौत के बाद हिंदू-मुस्लिम के बीच हुए झगड़े के बाद दोनों को कुछ फूल ही मिले, वह फूल सांप्रदायिक सौहार्द की मिठास आज भी घोल रहे हैं। सारी दुनिया को प्रेम और मानवता का संदेश देने वाले संत कबीर की परिनिर्वाण स्थली में आज भी सांप्रदायिक सौहार्द की गूंज भजन और आजान के तौर पर सुनाई देती है। कबीर चौरा कैंपस में मौजूद प्राचीन शिव मंदिर में पूजा और कबीर मठ से सटी मस्जिद में आजान होती है। जब मंदिर में शिव भक्त घंटा बजाकर अपनी भक्ति भावना में लीन नजर आते हैं, तो वहीं कुछ दूर पर मौजूद मस्जिद में आजान होने के साथ ही नमाजियों की कतारें मस्जिदों का रुख करती हैं। दोनों जगह से निकलने वाली आवाजों से कबीर का संदेश पूरी दुनिया में पहुंचता है।

महज 100 मीटर की है दूरी

संत कबीरदास ने अपने निष्पक्ष सत्योपदेश से हिंदू और मुसलमान दोनों को सही रास्ता दिखाने की कोशिश की। कबीर चौरा में रहने वाले जिम्मेदार संतोष दास की मानें तो उनके इन्हीं विचारों का असर कबीर चौरा मगहर में हर तरफ रख बसा दिखता है। संत कबीरदास की परिनिर्वाण स्थली मगहर के कबीर चौरा कैंपस में प्राचीन मस्जिद और शिव मंदिर लगभग 100 मीटर की दूरी पर स्थित हैं। यहां मुसलमान और हिंदू अपनी धार्मिक रीतियों से पूजा और इबादत करते हैं। यहां हर दिन नमाज और पूजा अनवरत होती चली आ रही है, लेकिन अब तक किसी भी तरह का छोटा सा विवाद भी नहीं हुआ।

स्थानीय लोगों ने उठाया है जिम्मा

कबीर मठ के महंत विचारदास की मानें तो मस्जिद का निर्माण कबीरदास के मगहर आने से पहले हो गया था। यहां के शिव मंदिर का जीर्णोद्धार गोरखपुर के तत्कालीन कमिश्नर हाबर्ट ने 1933 में करवाया। उनके बेटे की तबीयत अचानक खराब हो गई थी। ऐसी मान्यता है कि यहां मन्नत मांगने पर बेटा ठीक हो गया, तो उन्होंने पुराने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। इसके बाद से समय-समय पर स्थानीय लोगों ने इसका जिम्मा उठा रखा है। आमी नदी के किनारे बने इस शिव मंदिर पर तीज-त्योहाराों के दौरान बड़ी तादाद में श्रद्धालु पहुंचते हैं और नदी में स्नान कर शिव को जल अर्पित करते हैं। मंदिर पर लगे शिलापट्ट में इस बात का उल्लेख है।

विचारों की अनूठी मिसाल

महंत की मानें तो संत कबीरदास के आने पहुंचने के बाद बड़ी तादाद में श्रद्धालु उनके विचारों को सुनने के लिए पहुंचते थे। कबीर को जानने और उनके बारे में अध्ययन करने आने वाले लोगों के लिए यह दोनों धर्मस्थल जनपद में सांप्रदायिक सद्भाव के प्रतीक के तौर पर मौजूद हैं और संत कबीर के विचारों की अनूठी मिसाल हैं। एकता की अनेक मिसाल समेटने वाले कबीर चौरा पर हर वर्ष देश के कोने-कोने से कबीर पंथियों के साथ ही विदेशियों का भी आना-जाना रहता है।

नवाब बिजली खां ने दी थी जागीर

कबीर चौरा परिसर में मौजूद समाधि और मजार की देखरेख करने के लिए जौनपुर के नवाब बिजली खां ने सुरति गोपाल साहब और एक अन्य कबीर भक्त को पांच-पांच सौ बीघे अलग-अलग जागीर दी थी। इसमें सुरति गोपाल साहब की जागीर कबीर चौरा से पांच किमी दूरी पर है, जो सहजनवा तहसील क्षेत्र में मौजूद है। यहां खेती से समाधि मंदिर पर रहने वालों के लिए खाने-पीने की व्यवस्था की जाती है।


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