रिसर्च में खुलासा 90 परसेंट दलितों को खाने में हुई परेशानी

Updated Date: Sun, 05 Jul 2020 09:36 AM (IST)

-लॉकडाउन का दलितों पर पड़ा गंभीर असर, 84 परसेंट दलित लोगों ने भोजन के लिए उधार लिए पैसे

-अलायन्स फॉर दलित राइट्स बिहार ने लॉकडाउन में दलितों की सामाजिक, आíथक और रोजगार की स्थिति पर किया रिसर्च

PATNA: लॉकडाउन का बिहार में दलितों के जीवन और रोगार पर गंभीर असर पड़ा है। 90 परसेंट दलित परिवारों ने सर्वेक्षण के दौरान बताया कि खाने में दिक्कत हुई। 84 परसेंट लोगों ने भोजन के लिए पैसा उधार लेने की बात कही। 65 परसेंट लोगों के कहा कि भूखे रहना पड़ा। वही 75 परसेंट लोगों को आधे पेट खाकर लॉकडाउन गुजारना पड़ा। यह हमारे समाज के लिए शर्मनाक है जो समुदाय पहले कुपोषण के शिकार हैं और उनका भोजन पहले निम्न स्तर का और साधारण होता था और अब पेट भरने में कटौती कर रहे हैं तो आप सोचिए कि उनका भोजन कैसा होगा। ये बातें अलायन्स फॉर दलित राइट्स बिहार के फादर एंटो जोसफ ने लॉकडाउन में दलितों की सामाजिक, आíथक और उनके रोजगार कि स्थिति पर हुए रिसर्च के आंकडें पेश करते हुए कही।

कल्याणकारी योजना का भी लाभ नहीं

फादर एंटो ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान दलित समुदाय के लोगों को कल्याणकारी योजनाओं का भी फायदा नहीं मिला। अप्रैल में 18 परसेंट और मई में 66 परसेंट लोगों को राशन नहीं मिल पाया। अप्रैल और मई में 90 परसेंट से ज्यादा बच्चों को आंगनवाड़ी से ाभ्ी कोई लाभ नहीं मिला। फादर एंटो जोसफ के कहा कि सर्वेक्षण के दौरान जब हमने लोगों से पूछा कि आपकी क्या मांग है सरकार से ऐसे में 74 परसेंट लोगों ने कहा कि हमें काम चाहिए, जबकि 17 परसेंट लोगों ने भोजन की मांग की।

आधे लोगों के पास राशन कार्ड नहीं

सिस्टर सुधा वर्गीस ने कहा कि लॉकडाउन का सबसे ज्यादा प्रभाव दलितों और उनमें भी खासकर महिलाओं, विधवा औरतों, परित्यक्ता स्त्रियों, बुजुर्ग और गर्भवती महिलाओं पर पड़ा है। कार्ड के बिना राशन नहीं मिलता है। 40 से 50 परसेंट मुसहर लोगों के पास राशन कार्ड नहीं है। इस समुदाय में रोज कमाकर खाने वाले लोग हैं। मनरेगा में जेसीबी से काम हो रहा है। गांव स्तर पर पीडीएस डीलर, मुखिया कि मॉनिटरिंग के लिए कोई नहीं है। दलित-महादलित परिवारों की स्थिति बहुत खराब है। पढ़ने और स्कूल जाने वाली लड़कियां कचड़ा चुनने को मजबूर हैं। इस दौरान अशोक प्रियदर्शी, कंचना बाला, महेंद्र रौशन, कपिलेश्वर राम, गजेन्द्र मांझी और फादर जोस करियाकट्ट ने भी अपने विचार रखे।

शोध पत्र पेश कर सरकार से मांग

-सभी दलित परिवारों को दिसंबर तक नियमित और मुफ्त राशन।

-सभी योग्य परिवारों को 1 माह के अंदर राशन।

-सभी दलित और आदिवासी महिलाओं को मनरेगा के तहत 100 दिन का रोजगार।

-बच्चों, किशोरियों, गर्भवती और नवजात बच्चों की पालन-पोषण करने वाली महिलाओं को नियमित रूप से पौष्टिक आहार।

Posted By: Inextlive
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