बुलंदशहर हिंसा अपनों की ही रक्षा करने में नाकाम साबित हो रही पुलिस गवाह हैं ये मामले

2018-12-05T12:55:05Z

हालात इस कदर बदतर हो चुके हैं कि पुलिस भीड़ से खुद अपनों की ही रक्षा करने में नाकाम साबित हो रही है। यहां पढ़े ये मामले

- डिप्टी एसपी जियाउल हक से लेकर सुबोध कुमार सिंह तक को छोड़कर मौके से भाग खड़े हुए पुलिसकर्मी

- जांच में लापरवाही के चलते इक्का-दुक्का मामलों को छोड़ नहीं पकड़ में आ सके हत्यारे

lucknow@inext.co.in
LUCKNOW : यूपी पुलिस..जिसका जिम्मा प्रदेश वासियों की सुरक्षा करना है. पर, हालात इस कदर बदतर हो चुके हैं कि वे भीड़ से खुद अपनों की ही रक्षा करने में नाकाम साबित हो रहे हैं. कुंडा में डिप्टी एसपी जियाउल हक हत्याकांड हो, मथुरा के जवाहरबाग में एएसपी मुकुल द्विवेदी व एसओ संतोष कुमार सिंह की बेरहमी से हत्या, बरेली में गोतस्करों द्वारा एसआई संतोष मिश्रा की हत्या या फिर सोमवार को बुलंदशहर में हुई इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या. सभी घटनाओं में बेकाबू भीड़ ने न सिर्फ इन जांबाज अफसरों को मौत की नींद सुला दिया बल्कि, इसका दुखद पहलू यह है कि इन अफसरों के साथ मौजूद रहे पुलिस के अफसर व कर्मी भी साथी को अकेला छोड़ कर भाग खड़े हुए. वहीं, इन जांबाजों की हत्या के बाद इन मामलों की जांच में भी जमकर लापरवाही देखने को मिली. आइए बताते हैं कुछ ऐसे मामले जो पुलिस विभाग के हालात को खुद-ब-खुद बयां करते हैं-

डिप्टी एसपी जियाउल हक हत्याकांड
2 मार्च 2013 को प्रतापगढ़ के कुंडा स्थित बलीपुर गांव में ग्राम प्रधान नन्हे यादव की हत्या कर दी गई. जिसके बाद हुई गोलीबारी में प्रधान के भाई सुरेश की भी मौत हो गई. दो हत्या व गांव में फायरिंग की सूचना पर पहुंचे सीओ कुंडा जिया उल हक को गुस्साई भीड़ ने उन्हें घेर लिया और गोली मारकर हत्या कर दी. इस दौरान उनके साथ मौजूद सात पुलिसकर्मी जान बचाकर मौके से भाग खड़े हुए.

जांच का हश्र- घटना के अगले ही दिन तत्कालीन खाद्य व रसद मंत्री रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया व चार अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई. राजा भैया को आपराधिक साजिश जबकि, उनके प्रतिनिधि हरिओम, नगर पंचायत अध्यक्ष गुलशन यादव, ड्राइवर रोहित सिंह व गुड्डू सिंह को आरोपी बनाया गया. हंगामा मचने पर मामले की जांच सीबीआई के सुपुर्द कर दी गई. सीबीआई ने जांच के बाद राजा भैया को क्लीन चिट दे दी जबकि, हत्या के मामले में प्रधान के परिवारीजनों को ही आरोपी बनाया. मुख्य आरोपी नाबालिग निकला.

एएसपी मुकुल द्विवेदी व एसआई संतोष यादव हत्याकांड
2 जून 2016 को मथुरा के जवाहर बाग में किये गए अवैध कब्जे को हटाने के लिये पहुंची पुलिस टीम का कब्जेदारों से खूनी संघर्ष हो गया. पुलिस के मुकाबले कब्जेदारों की संख्या ज्यादा होने की वजह से वे पुलिस पर भारी पड़े. नतीजतन, पुलिसकर्मी जान बचाकर वहां से भागने लगे. पर, कब्जेदारों से मोर्चा लिये एएसपी मुकुल द्विवेदी व एसओ संतोष यादव भीड़ के हत्थे चढ़ गए और उनकी हत्या कर दी गई. इस संघर्ष में कब्जेदारों के सरगना रामवृक्ष यादव समेत 27 अन्य लोगों की भी मौत हो गई थी.

जांच का हश्र- कब्जा खाली कराने के बाद पुलिस ने मौके से 47 बंदूकें, 6 राइफल व 179 हथगोले बरामद किये थे. पुलिस ने कुल 368 लोगों को अरेस्ट किया. जिनमें, रामवृक्ष का दाहिना हाथ चंदन बोस बस्ती से दबोचा गया. हालांकि, एएसपी द्विवेदी व एसओ संतोष यादव के असल हत्यारों का अब तक पता नहीं लग सका. वहीं, मामले की जांच सीबीआई अब भी कर रही है.

एसआई मनोज मिश्रा हत्याकांड
बरेली के फरीदपुर थाने में तैनात दारोगा मनोज मिश्रा 9 सितंबर 2015 को रात्रि गश्त पर थे. इसी दौरान उन्हें एक गाड़ी पर गोतस्कर गाय लादकर ले जाते दिखे. दारोगा मिश्रा ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो तस्करों ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी. इस दौरान उनके साथ मौजूद फोर्स फायरिंग होता देख मौके से भाग निकली. इस हत्याकांड ने बरेली में पुलिसकर्मियों के बीच आक्रोश भर दिया.

जांच का हश्र- पुलिस ने दो दिनों के बाद ही गोतस्कर जफरुद्दीन उर्फ मटरुआ को अरेस्ट किया. बताया गया कि मटरुआ ने ही दारोगा मिश्रा को गोली मारी थी. हत्याकांड में अन्य आरोपियों के भी शामिल होने का जिक्र किया गया लेकिन, उसके बाद पुलिस की जांच की रफ्तार धीमी पड़ती चली गई.

सख्त संदेश जरूरी
प्रदेश के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह भीड़ के द्वारा पुलिस अधिकारियों की हत्या को समाज में पनप रहा खतरनाक ट्रेंड मानते हैं. सिंह कहते हैं कि पहले पुलिस का इकबाल बड़ी चीज होती थी. अपराधी पुलिस का नाम सुनते ही कांप जाते थे पर, राजनेताओं द्वारा अपराधियों को प्रश्रय देने से हालात बद से बद्तर होते चले गए. अब हालात यह है कि आपराधिक प्रवृत्ति के लोग पुलिस से सीधे भिड़ने से गुरेज नहीं करते. वजह भी साफ है, वे यह जानते हैं कि अगर वे अरेस्ट किये गए तो उनकी पैरवी आसानी से हो जाएगी. इसके साथ ही लोगों को कृत्रिम मुद्दों पर भड़काया जा रहा है. यही भीड़ सड़कों को निकलकर किसी की भी हत्या करने से बाज नहीं आ रही. फिर चाहे वह आम शहरी हो या फिर कोई पुलिस वाला. ऐसे मामलों में सरकार को सख्त संदेश देने की जरूरत है, कि जो भी ऐसी हरकत करेगा उसे बख्शा नहीं जाएगा और उसे कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी.


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