हजारों सूनी गोद को भर चुकी हैं डॉ इंदू

2018-12-15T06:00:57Z

-18 साल से नि:संतान दंपत्तियों की गोद में भर रही हैं किलकारी, आईवीएफ पद्धति की हैं स्पेशलिस्ट

सूनी गोद का दंश किसी महिला को कितना दर्द देता है इसका अंदाजा लगा पाना भी कठिन है। पर यदि योग्य डॉक्टर का परामर्श मिल जाये तो इस दर्द का इलाज संभव है। अपने शहर बनारस में ऐसे डॉक्टर्स की एक लंबी फेहरिस्त है। पर उनमें से एक खास नाम ऐसा है जिनको हजारों सूनी गोद में किलकारी से भरने का श्रेय जाता है। जी हां वह हैं शहर की सूर्या सुपरस्पेशियलिटी हॉस्पिटल की डायरेक्टर व सीनियर गायनकोलॉजिस्ट डॉ इंदू सिंह। पिछले 18 साल से मायूस चेहरों पर खुशी लाने का काम कर रही डॉ इंदू का नाम सिर्फ बनारस ही नहीं पूरे पूर्वाचल में एक खास पहचान रखता है। इनके समर्पण और सेवा का ही नतीजा है कि उनके हाथों ने हजारों माताओं को सबसे बड़ी खुशी की सौगात मिली है।

महमूरगंज स्थित सूर्या बाग कॉलोनी गायनकोलॉजिस्ट डॉ। इंदू सिंह बताती हैं कि उनका करियर काफी संघर्ष और चैलेंजिंग रहा है। शुरु से ही उनके मन में था कि वे उन महिला डॉक्टर्स के लिए मिसाल बनें जो नि:संतान दंपतियों को संतान का सुख देने के लिए आईवीएफ पद्धति का शहर में शुरुआत कर सकें। एक समय था जब उन्हें लगा कि उनका सपना साकार नहीं हो पाएगा। लेकिन संकटमोचन ने उनका हर संकट हर लिया और वे अपने मकसद में कामयाब होती गई। डॉ। इंदू बताती हैं कि उनके परिवार में कोई भी डॉक्टर नहीं था। क्योंकि खून में टीचिंग थी। आठ भाई बहनों में सभी बहन पीएचडी और भाई इंजीनियर है। पिता इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे। शादी से पहले सभी भाई-बहनों की सोच यही थी कि पढ़ाई के सिवा उनके पास कोई और काम नहीं है। पिता नहीं चाहते थे कि वे डॉक्टर बने फिर भी उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से एमबीबीएस की। इसके बाद बीएचयू मेडिकल कॉलेज से पीजी किया। लेकिन उसी बीच सेकेंड सेमेस्टर में ही उनकी शादी तय हो गई। हालांकि शादी के बाद भी उनका सफर जारी रहा।

नि:संतानों की सेवा का है जुनून

डॉ। इंदू बताती हैं कि 1979 में उनकी शादी हुई। पति अरूण कुमार सिंह पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर हैं। पति पत्‍‌नी का सेम प्रोफेशन न होने के बारे में कहती हैं उन्होंने कभी इस बारे में सोचा ही नहीं था कि पति भी डॉक्टर हों। दोनों अपने प्रोफेशन से खुश हैं। परिवार गांव से जुड़ा था, इसलिए ज्यादा कुछ पूछा भी नहीं जाता था। हालांकि उन्होंने शादी पढ़ाई पूरी करने के बाद ही की। वे बताती हैं अपनी भाभी और एक टीचर को लंबे समय तक संतान न होने का दंश झेलते हुआ देखा था। उसी समय उन्होंने तय कर लिया था कि अब उन्हें इनफर्टिलिटी के फील्ड में काम करना है।

प्रतापगड़ में भी रहीं

डॉ। इंदू बताती हैं कि शादी के तुरंत बाद उनके हाथ में कोई जॉब नहीं था। पीजी पूरा करने के बाद घर में खाली बैठना ठीक नहीं लगा। लिहाजा शादी के चार साल बाद 1984 में पति को एक प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए प्रतापगड़ जाना था, इत्तेफाक से वहीं पर मेडिकल ऑफिसर का पद खाली था, इसलिए वे भी पति के साथ वहीं चली गई। पति के प्रोजेक्ट खत्म होने के बाद वहां से वे 1990 में वापस आ गई। बनारस वापस आने के बाद उन्होंने सेवासदन हॉस्पिटल में दो साल काम किया। फिर जनकल्याण हॉस्पिटल में मैटरनिटी चाइल्ड विंग बनाकर काम किया। हालांकि ये हॉस्पिटल अभी बंद हो गया है। लेकिन मन न मानने पर उन्होंने उसे भी छोड़ दिया।

फिर शुरु हुआ सफर

सबसे पहले डॉ। इंदू ने सन 2000 में गोदौलिया के पास संजीवनी मैटरनिटी हॉस्पिटल बनाया। इसके बाद इन्होंने मार्च 2002 में सूर्या मेडिटेक एंड रिसर्च सेंटर हॉस्पिटल की स्थापना की। इस हॉस्पिटल की खास बात ये है कि पूर्वाचल में पहली बार इस संस्था में आईवीएफ टेस्ट ट्यूब बेबी की शुरुआत हुई। इस हॉस्पिटल में पिछले 16 सालों में अब तक 556 आईवीएफ बेबी का जन्म दिया जा चुका है। डॉ। इंदू बताती हैं कि उनके हॉस्पिटल में आईवीएफ की शुरुआत जब हुई तो पहले दंपति को टेस्ट ट्यूब से बेटी हुई जिसका नाम आस्था रखा गया। ऐसा इसलिए कि उनकी आस्था और विश्वास डॉ। इंदू और और उनके द्वारा शहर में लायी गई नई टेक्नोलॉजी पर थी। 16 साल की इस सफलता का असर है कि आज यहां टेस्ट ट्यूब बेबी के लिए सिर्फ बनारस से नहीं दिल्ली, मुंबई और विदेश से भी दंपति आ रहे हैं।

नहीं है कॉम्पटीशन

डॉ। इंदू बताती हैं कि उनके हॉस्पिटल का किसी से कोई कॉम्पटीशन नहीं है। जिंदगी में शुरु से तय किया था कि उस रास्ते में नहीं जाउंगी जहां हर हॉस्पिटल चले जा रहे हैं। मरीज की खुशी से बढ़कर कोई अवार्ड नहीं है। हम सिर्फ पैसे के लिए हॉस्पिटल नहीं चलाते। यह एक इमोशनल इश्यू है।

जो मन में था वही किया

वह बताती हैं कि उनके मन में जो आ चुका था वही किया। खुद को लगा कि नौकरी करनी ही नहीं है, नौकरी वो आजादी नहीं होती जो आप चाहते हैं बीएचयू में काम न करने का गम नहीं है। अगर वहां नौकरी करती तो आज यह मुकाम नहीं मिलता।

बीएचयू से भी मिली मदद

डॉ। इंदू बताती है कि बीएचयू से बहुत मदद मिली। खासकर मेडिकल ऑफ बायो एंड ह्यूमन जेन्टिक्स डिपार्टमेंट से। टेस्ट ट्यूब बेबी में ज्यादातर काम एब्रेलियोजी का ही होता है। उन्होंने बताया कि उनके गुरु डॉ। अशोक अग्रवाल और डॉक्टर भूषण कंगरारे एम्ब्रोलिआजी हेड थे उन्होंने फ्री में सब कुछ सिखाया। उनका कहना था कि किसी ने हिम्मत तो दिखायी कि इस विषय पर काम करने के लिए। आईवीएफ का काम शुरु करने के लिए दोनों डॉक्टर दो साल तक दिसंबर की छुट्टियो में अमेरिका से आकर फ्री में काम किया करते थे। वे बताती हैं कि पहले दंपतियों में आईवीएफ के लिए बहुत सारी शंका थी , जो अब खत्म हो रही है।

नाम: डॉ। इंदू सिंह

पति: अरूण कुमार सिंह, मैकेनिकल इंजीनियर

परिवार में: 5 मेंबर

एक बेटा, दो बेटी

पता। सूर्या बाग कॉलोनी महमूरगंज

मूल पता: गाजीपुर

डीओबी: 20 अक्टूबर 1957

एजुकेशन: इलाहाबाद मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस, बीएचयू से पीजी

हॉबी। डांस, फन, पार्टी, घूमना, फोटोग्राफी,

पसंद व्यंजन: वेजिटेरियन, मिठाई


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