एमडीए में पॉवर ऑफ अटार्नी का खेल

Updated Date: Wed, 02 Sep 2015 07:00 AM (IST)

- प्राधिकरण की 80 प्रतिशत प्रोपर्टी फर्जी पॉवर ऑफ अटार्नी के सहारे

- रकम बचाने के चक्कर में प्रोपर्टी खरीदार खा रहे धोखा

- फर्जी पॉवर ऑफ अटार्नी के कारण हजारों लोग काट रहे एमडीए के चक्कर

Meerut: एमडीए की अस्सी फीसदी संपत्तियों के मालिक आज वे बने बैठे हैं जिसके नाम मूल आवंटी ने पॉवर ऑफ अटार्नी कर दी है। स्टांप चोरी के इस बड़े खेल ने एमडीए की जड़ में दबे सबसे बड़े भ्रष्टाचार से परदा हटाने का काम किया है। मिलीभगत से संपत्ति की खरीद-फरोख्त कर पॉवर ऑफ अटार्नी के हथियार से बड़ा खेल एमडीए में लंबे समय से चला आ रहा है।

क्या है मामला

मेरठ विकास प्राधिकरण पॉवर ऑफ अटार्नी के नाम पर 80 फीसदी प्रोपर्टी की खरीद फरोख्त हो गई है। फर्जीवाड़े का मामला सामने तब आया जब एमडीए ने सेकंड पार्टी के नाम रजिस्ट्री से इंकार करने पर कुछ लोगों ने बखेड़ा खड़ा कर दिया। हंगामा करने वाले इन लोगों ने एमडीए अफसरों के सामने तमाम उदाहरण पेश करते हुए अपने नाम रजिस्ट्री कराने की मांग की।

घालमेल का खेल

अंसल में यह सारा खेल उस मोटे पैसे के बचाने के लिए किया जाता है, जो सरकारी राजस्व कोष में जमा होता है। मूल आवंटी पैसे लेकर अपनी प्रोपर्टी की पॉवर ऑफ अटार्नी सेकंड पार्टी के नाम कर देता है। वास्तव में सौ रुपए के स्टांप पर होने वाली यह अटार्नी का कोई सरकारी कन्सर्न नहीं होता। इसके बाद मूल आवंटी के स्थान पर खरीदार यानी सेकंड पार्टी एमडीए में उस प्रोपर्टी की किस्त चुकाती रहती है। इस तरह किस्तों का भुगतान जब पूरा हो जाता है तो एमडीए बाबुओं से सांठगांठ कर उसी फर्जी पॉवर ऑफ अटार्नी के आधार पर सेकंड पार्टी के नाम रजिस्ट्री कर दी जाती है।

सरकारी राजस्व घाटा

प्रोपर्टी खरीद-फरोख्त के इस खेल में सरकारी राजस्व को करोड़ों का फटका लगता है। दरअसल, किसी भी प्रोपर्टी की रजिस्ट्री के दौरान लाखों की कीमत वाले स्टांप के साथ बड़ी मात्रा में रजिस्ट्री शुल्क चुकाना होता है। लेकिन फर्जीवाड़े के इस घालमेल में लाखों रुपए के राजस्व वाली यह पूरी प्रक्रिया महज सौ रुपए के स्टांप के सहारे ही पूरी कर ली जाती है। इस तरह से सरकार को इस घालमेल का बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ता है।

ये हैं नियम

यदि मानकों की बात करें तो इस तरह की रजिस्ट्री तभी की जा सकती है, जब खरीदार के पास रजिस्टर्ड पॉवर ऑफ अटार्नी हो। होता यह है कि पॉवर ऑफ अटार्नी के बाद भी एमडीए के दस्तावेजों में मूल आवंटी का ही नाम चलता रहता है। यहां तक कि सेकंड पार्टी द्वारा जमा कराई गई किस्त भी मूल आवंटी के नाम पर ही जमा होती हैं। किस्त पूरी होने पर जब रजिस्ट्री की बारी आती है तो एमडीए उस पॉवर ऑफ अटार्नी की जांच कराता है। जांच में यदि सभी सही पाया जाता है तो मूल आवंटी की सहमती पत्र के आधार पर सेकंड पार्टी के नाम रजिस्ट्री कर दी जाती हैं।

यहां भी है फर्जीवाड़ा

फर्जीवाड़े के इस खेल में मूल आवंटी के दोनों हाथों में लड्डू रहते हैं। एमडीए में कई मामले तो ऐसे सामने आए हैं, जब एक मूल आवंटी ने पॉवर ऑफ अटार्नी के आधार पर एक से अधिक लोगों को अपनी प्रोपर्टी बेच डाली। यहां तक कि प्रोपर्टी बेचने के बावजूद जब रजिस्ट्री की बारी आती है तो मूल आवंटी अपनी असहमति जताकर सेकेंड पार्टी को ब्लैकमेल करता है और सहमति पत्र के बदले मोटी रकम की मांग करता है।

45 हजार प्रोपर्टी

वर्तमान में एमडीए के रिकॉर्ड में 45 हजार प्रोपर्टी है। सूत्रों की मानें तो इसमें से 35 हजार प्रोपर्टी की खरीद फरोख्त पॉवर ऑफ अटार्नी के नाम पर ही हो गई है। अब इन प्रोपर्टी पर न केवल सेकंड और थर्ड पार्टी काबिज हैं, बल्कि उनके पास प्रोपर्टी के सभी लीगल दस्तावेज भी उपलब्ध हैं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पॉवर ऑफ अटार्नी के मामले बिल्कुल बंद कर दिए गए हैं। फर्जी वाले मामले में जांच कराकर कार्रवाई कराई जाएगी।

-बैजनाथ, अपर सचिव एमडीए

Posted By: Inextlive
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