मेसी बन गए माराडोना पर 1986 वाले नहीं 1990 वाले माराडोना

2014-07-15T10:58:52Z

अर्जेंटीना और उसके तमाम प्रशंसक चाहते थे कि विश्व कप फुटबॉल के फाइनल में 1986 का इतिहास दोहराया जाए इतिहास दोहराया गया पर 1986 का नहीं 1990 का स्कोरलाइन वही 1990 वाली 10 और एक बार फिर ये साबित हो गया कि विश्व कप चैम्पियन का फैसला रूमानियत से नहीं खेल से होता है जर्मनी ने पहली बार लैटिन अमेरिकी धरती पर यूरोप का परचम लहरा दिया 24 साल तक हर विश्व कप में अच्छा खेल कर खिताब से दूर रहने वाली जर्मनी की टीम ने आखिरकार विश्व कप हासिल कर ही लिया पढि़ए अर्जेंटीना की हार और जर्मनी की जीत को लेकर सीनियर न्‍यूज एडिटर उमंग मिश्र का विस्‍तृत विश्‍लेषण

मेसी बनाम क्लोसा
एक ओर मेसी थे जिनके नाम विश्व कप शुरू होने से पहले सिर्फ एक विश्व कप का गोल था फिर भी वो दुनिया की आंखों के तारे थे और दूसरी ओर जर्मनी के मिरोस्लाव क्लोसा थे तो इस विश्व कप से पहले तीन विश्व कप में कुल 14 गोल मार चुके थे लेकिन फिर भी चर्चा से बाहर थे. सपना पूरा हुआ पर सुपर स्टार मेसी का नहीं पिछले तीन विश्व कप के अनसंग रह गए हीरो क्लोसा का जिनके करिअर में विश्व कप की सफलता जुड़ गई.

डिजर्विंग टीम ही जीतती है विश्व कप
विश्व कप की सबसे बड़ी खासियत ये है कि चैम्पियन हमेशा बेस्ट टीम ही बनती है. किस्मत बेस्ट टीम के साथ कोई खेल नहीं करती. 2010 में स्पेन की ड्रीम टीम, 2006 में इटली, 2002 में रोनाल्डो की ब्राजील, 1998 में जिडान की फ्रांस, 1994 में रोमारियो और बेबेटो की ब्राजील, 1990 में मैथायस और क्लिंसमैन की जर्मनी और 1986 में माराडोना की अर्जेंटीना. ये सभी वास्तव में उस विश्व कप की बेस्ट टीमें ही थीं. और यही बात इस विश्व कप में जर्मनी के लिए भी कही जा सकती है. जर्मनी की ये टीम लो प्रोफाइल स्टार्स की टीम थी. फिलिप लाम, क्लोसा, ओ जील, श्वाइंसटाइगर आप किसी को भी देखिए. इस टीम में कोई क्रिस्टियानो रोनाल्डो नहीं, कोई मेसी नहीं. यहां तक की कोच जोकिम लियु भी लो प्रोफाइल पसंद करने वाले थे. पर ये सब मिलकर एक बेहद मजबूत टीम बनाते थे भले ही फ्लेमबॉयंस न दिखाते हों.
जर्सी के साथ किस्मत ने भी बदल दिया रंग
जब अर्जेंटीना लाइट-ब्लू और व्हाइट पट्टियों वाली जर्सी की जगह गाढ़े नीले रंग की जर्सी के साथ उतरी तो उसे नहीं पता रहा होगा कि किस्मत भी उसके साथ रंग बदल देगी. पहले हाफ में जर्मनी ने हमले बोलने शुरू किए तो अर्जेंटीना ने इस विश्व कप में पहली बार जाना कि दबाव क्या चीज होती है. फाइनल से पहले अपने किसी भी मैच में पहला गोल अर्जेंटीना ने नहीं झेला था. पर फाइनल में उसका खतरा पहले ही हाफ में मंडरा रहा था. अर्जेंटीना के काउंटर अटैक्स में वो धार नहीं थी. वजह साफ थी. लियोनेल मेसी की हैवी मार्किंग थी और मिडफील्ड में डि मारिया नहीं थे जो मेसी को हर मैच में सबसे ज्यादा गेंद फीड करते थे. डि मारिया की कमी अर्जेंटीना को बहुत खली क्योंकि ये मिडफील्डर न सिर्फ मेसी को बार-बार गेंद पहुंचाता था बल्कि खुद भी आगे बढ़ कर हमले बोलता था. डि मारिया की चोट फाइनल तक ठीक नहीं हो पाई और इसका असर अर्जेंटीना के अटैक पर साफ दिखाई दिया.
जिंदगी भर पछताएंगे हिगुएन
पहले हाफ में ही अर्जेंटीना के हिगुएन को एक सुनहरा मौका मिला जब जर्मन डिफेंस की चूक से अनमार्कड पोजीशन पर उन्हें बॉल मिल गई जबकि सामने सिर्फ गोलकीपर नोयर थे. इतना आसान मौका पूरे मैच में किसी को फिर नहीं मिला लेकिन हिगुएन ने गेंद बाहर मार दी.
दूसरे हाफ में आई तेजी
दूसरे हाफ में अर्जेंटीना ने रणनीति को ज्यादा आक्रामक बनाया और लवेजी की जगह अगुएरो को उतार कर अटैक मजबूत किया. अब मेसी, हिगुएन और अगुएरो तीनों मैदान में थे. अर्जेंटीना ने हमले बढ़ाए और जर्मनी ने भी खतरनाक काउंटर अटैक्स किए पर दूसरे हाफ में भी गोल न हो सका. एक बार नैरो एंगल से मौका मेसी को भी मिला पर वो गोल नहीं कर सके.
दोनों तरफ से बेहतरीन डिफेंस
एक ओर से मेसी, हिगुएन और अगुएरो हमले बोल रहे हों और दूसरी ओर से क्लोसा, लाम, श्वाइंसटाइगर और ओ जील फिर भी 113 मिनट तक कोई गोल न हो तो फिर मैच के विजेता तो डिफेंडर्स हुए. क्लीन डिफेंडिंग क्या होती है ये अपने पड़ोसी अर्जेंटीना से सीख सकता है ब्राजील.
जिसने किया पेनाल्टी शूट आउट का इंतजार वो हारा
जब 90 मिनट तक दोनों टीमें गोल नहीं कर सकीं तो एक्ट्रा टाइम शुरू हुआ. पहले 15 मिनट में दोनों टीमों ने गोल करने के लिए जान लगा दी पर नतीजा वही सिफर. एक्ट्रा टाइम के दूसरे हाफ में जब खेल शुरू हुआ तो लगा अर्जेंटीना ने मान लिया है कि मैच का फैसला पेनाल्टी शूट आउट से होगा. अर्जेंटीना थोड़ा सा डिफेंसिव हुई और यहीं पर खेल हो गया. एक्ट्रा टाइम खत्म होने के सात मिनट पहले क्लोसा की जगह आए रिप्लेसमेंट गोट्जे ने वो कर दिखाया जो उस मैच में बड़े-बड़े नहीं कर पाए थे. गोट्जे ने गेंद को सीने से कंट्रोल किया और बेहतरीन वॉली करके गोल जड़ दिया. अर्जेंटीना और पूरी दुनिया में उसके प्रशंसक स्तब्ध रह गए. सबको पता था कि बाकी बचे 6 मिनट में गोल उतार पाना मुश्किल की नहीं नामुमकिन है. 22 साल के युवा ने 24 साल का सूखा खत्म कर दिया था. इकलौते खिलाड़ी मेसी के बल पर खेलने की सजा अर्जेंटीना को मिलने जा रही थी.
गोल्डन बॉल पाकर भी निराश
अर्जेंटीना के मेसी को बेस्ट प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट घोषित किया गया और गोल्डन बॉल का अवॉर्ड मिला पर मेसी इस विश्व कप में गोल्डन बॉल नहीं 18 कैरेट गोल्ड का बना कप लेने आए थे. और वो कप उनकी आंखों के सामने जर्मनी वाले उठाए फिर रहे थे. जर्मनी के गोल कीपर नोयर को गोल्डन ग्लब्स अवॉर्ड मिला यानि आधिकारिक तौर पर वो विश्व कप के बेस्ट गोल कीपर घोषित हुए.
माराडोना तो बन गए मेसी पर 1986 वाले नहीं 1990 वाले
लियोनल मैसी अकेले अपने दम पर टीम को फाइनल तक ले गए वैसे ही जैसे 1990 में माराडोना ने किया था. लेकिन वो 1986 वाले माराडोना नहीं बन सके जिसने विश्व कप जिताया था.  लेकिन मेसी के पास 1986 के वल्डानो और बुरुचागा नहीं थे. मेसी का आकलन करते समय ये बाद हमेशा याद रखनी होगी. मेसी को मिले अगुएरो और हिगुएन जो निराश करते रहे. इकलौता सहारा डी मारिया भी चोटिल होकर फाइनल से बाहर हो गया. लियोनल मेसी अकेले जो कर सकते थे वो किया. अब किस्मत भी रोज रोज माराडोना कहां बनने देती है किसी को.
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