पाकिस्‍तान जेल से रिहा हुए बाबा जान ने लोगों को दिया धन्यवाद, गिलगिट बाल्टिस्‍तान को आज भी नहीं मानते पाक का हिस्सा

Updated Date: Sat, 28 Nov 2020 03:26 PM (IST)

पाकिस्‍तान सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले और गिलगिट बाल्टिस्‍तान को पाकिस्‍तान का हिस्‍सा न मानने वाले बाबा जान की शुक्रवार को पाक जेल से रिहाई हो गई है। रिहाई के तुरंत बाद बाबा जान ने अब तक अपने साथ खड़े लोगों का शुक्रिया अदा किया।


गिलगित बाल्टिस्तान (एएनआई)। गिलगिट बाल्टिस्‍तान को पाकिस्‍तान का हिस्‍सा न मानने वाले और सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाले राजनीतिक कार्यकर्ता बाबा जान को करीब एक दशक बाद जेल से रिहाई मिल ही गई। पाकिस्तानी अधिकारियों द्वारा शुक्रवार को रिहा किए गए बाबा जान ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के लोगों और अधिकार कार्यकर्ताओं को उनकी रिहाई के लिए विरोध प्रदर्शन करने के लिए धन्यवाद दिया। अपनी रिहाई के बाद मीडियाकर्मियों से बात करते हुए, जान ने कहा मैं गिलगित बाल्टिस्तान के सभी लोगों, पाकिस्तान के लोगों और सभी कार्यकर्ताओं का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं जो इन सभी वर्षों में मेरे साथ खड़े रहे। उनके प्रयासों के कारण है कि मुझे छोड़ दिया गया है अन्यथा मैं अभी भी जेल में होता। मैं उन लोगों का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं जो मुझे कैद में रखने के बाद मुझे नहीं भूले और मेरी आजादी सुनिश्चित करने के लिए मेरे लिए लड़े। ऐसे में बाबा जान काे वर्ष 2011 में जेल में डाल दिया गया था
बाबा जान ने गिलगिट-बाल्टिस्‍तान पर पाकिस्‍तान की सरकार को खुली चुनौती देते हुए कहा था कि इस पर पाकिस्‍तान का अवैध कब्‍जा है। उन्‍होंने यहां पर पाकिस्‍तान का कानून लागू होने के खिलाफ भी आवाज उठाई थी। ऐसे में उन्‍हें वर्ष 2011 में जेल में डाल दिया गया था और उन पर मुकदमा चलाया गया था। इस दाैरान आतंकवाद विरोधी कोर्ट ने उन्‍हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। एक जन आंदोलन में भाग लेने के लिए आतंकवाद निरोधक अदालत द्वारा हुंजा, अमीर खान और इफ्तेखार हुसैन के दो अन्य युवा कार्यकर्ताओं को भी दोषी ठहराया था।बाबा जान और अन्य राजनीतिक कार्यकर्ताओं का मुद्दा उठाया बार-बार, गिलगित बाल्टिस्तान के राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने संयुक्त राष्ट्र सहित अंतरराष्ट्रीय प्लेटफार्मों पर बाबा जान और अन्य राजनीतिक कार्यकर्ताओं का मुद्दा उठाया है, लेकिन इस्लामाबाद आतंकवाद विरोधी अधिनियम की अनुसूची-IV के तहत लोगों का दमन कर रहा है। बाबा जान का मामला उस क्षेत्र में मानवाधिकारों के लिए खेदजनक स्थिति की याद दिलाता है, जहां एक कार्यकर्ता और राजनीतिक कार्यकर्ता को अन्याय और राज्य उत्पीड़न के खिलाफ अभियान चलाने के लिए आजीवन कारावास की सजा का सामना करना पड़ा।

Posted By: Shweta Mishra
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