राजेंद्र प्रसाद थे राजनीतिक संत

2014-12-04T07:00:52Z

- कहा, राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष न होते तो शायद बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर इतनी आसानी से संविधान पूरा न कर पाते

LUCKNOW: देश के पहले राष्ट्रपति डॉ। राजेन्द्र प्रसाद मृदुभाषी, अनुशासनप्रिय सादगी पसंद व्यक्ति थे। राजेन्द्र बाबू को राजनीति में होते हुए थी राजनीतिक संत कहा जा सकता है। राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष न होते तो शायद बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर इतनी आसानी से संविधान पूरा न कर पाते। राजेन्द्र बाबू ने ही सभी लोगों में समन्वय बनाकर देश के संविधान को पूरा करने में सहयोग दिया। यह बात बुधवार को प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने लखनऊ यूनिवर्सिटी के मालवीय सभागार में राजेन्द्र प्रसाद मेमोरियल सोसायटी की ओर से आयोजित राष्ट्रपति डॉ। राजेन्द्र प्रसाद की क्फ्0वीं जयंती समारोह में चीफ गेस्ट के तौर पर कहीं।

राष्ट्रगान पर था विवाद

राज्यपाल राम नाईक ने कहा कि देश में पहली बार स्वतंत्रता की लडाई सन क्8भ्7 में आरंभ की गयी थी। महात्मा गांधी ने दूसरी पीढ़ी के संघर्ष का नेतृत्व किया। गांधी की लड़ाई सभी दृष्टि से सर्वोत्तम रही। डॉ। राजेन्द्र प्रसाद ने गांधी जी के बाद सबकुछ न्योछावर कर दिया और आजादी की लड़ाई में निष्ठा से लड़े। डॉ। राजेन्द्र बाबू बेहद अच्छे समन्वयक थे। संविधान सभा के सभी सदस्यों के बीच समन्वय बनाकर उन्होने संविधान सभा के अध्यक्ष पद के कर्तव्य का निर्वाह किया। समन्वय क्षमता के बात में बताते हुए उन्होने कहा कि राष्ट्रगान पर संविधान के सदस्यों में विवाद था। संविधान सभा के सदस्य वंदे मातरम को राष्ट्रगान बनाना चाहते थे लेकिन पं। जवाहर लाल नेहरू जन गण मन को राष्ट्रगान की मान्यता देना चाहते थे। राजेन्द्र बाबू ने अध्यक्ष के रूप में निर्देश दिया कि वंदे मातरम को राष्ट्रगीत तथा जन गण मन को राष्ट्रगान घोषित किया जाएगा। दोनों का समान रूप से सम्मान किया जाएगा।

गांधी जी के साथ मिलकर किया संघर्ष

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि और विधान सभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय ने कहा कि डॉ। राजेन्द्र प्रसाद मेधावी छात्र श्रेष्ठ नेता, योग्य राष्ट्रपति योग्य वकील थे। उन्होने नील की खेती करने वाले किसानों के लिए गांधी से मिलकर आंदोलन कराया। राजेन्द्र बाबू सादगी पसंद करने वाले व्यक्ति थे। उनके समय में राष्ट्रपति भवन में अत्यधिक सादगी रहती थी। सामाजिक भावनाओं पर आजादी की लड़ाई के दौरान बहुत हमले हुए लेकिन डॉ। राजेन्द्र प्रसाद ने भारतीय परम्पराओं को बचाने के लिए सदैव प्रयास किया। इस अवसर पर केजीएमयू के वीसी डॉ। रविकांत ने राजेन्द्र बाबू के गुणों को अपनाने की शिक्षा देते हुए कहा कि शिक्षा, विविधता, सहानुभूति सामन्जस्य और समन्वय जैसे गुणों से ही एक व्यक्ति भारत बना गया। वहीं एलयू प्रो। एसबी निमसे ने कहा कि राजेन्द्र प्रसाद ने गांधी जी के साथ संघर्ष में भाग लिया। दो बार राष्ट्रपति बने तथा सन भ्ख् से म्ख् तक कई बार नेहरू से वैचारिक संघर्ष हुआ लेकिन कभी अपने वैचारिक संघर्ष को राजनीतिक रूप नहीं दिया। संविधान बनाने में उनका योगदान अविस्मरणीय है।


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