हैदराबाद की गिरती हुई ब्रांड इमेज

2011-08-30T14:35:00Z

गत दो वर्षों की राजनीतिक उथलपुथल अलग तेलंगाना राज्य के लिए चल रहे आंदोलन और अब वाईएस जगनमोहन रेड्डी के समर्थकों की खड़ी की हुई राजनीतिक अस्थिरता ने आंध्र प्रदेश की ब्रांड इमेज को भारी नुक़सान पहुँचाया है

आंध्र प्रदेश और उसमें भी ख़ास तौर पर हैदराबाद की छवि गत एक दशक में सूचना प्रौद्योगिकी और फार्म उद्योग में एक अंतरराष्ट्रीय केंद्र की बनी थी. मगर हैदराबाद अब एक कठिन समय से गुज़र रहा है और उसकी अर्थव्यवस्था को गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.

अगर अब तक तेलंगाना राज्य के पक्ष में आन्दोलन और बार-बार होने वाली हड़तालों से हैदराबाद में वाणिज्यिक और आर्थिक गठिविधियाँ प्रभावित हो रहीं थीं तो अब कडप्पा के लोकसभा सदस्य वाईएस जगनमोहन रेड्डी के विरुद्ध सीबीआई जाँच के आदेश बाद उन के समर्थक 26 विधायकों के त्यागपत्र ने राजनीतिक अस्थिरता को और भी बढ़ा दिया है.

अगर राज्य का तेलंगाना क्षेत्र अलग राज्य के पक्ष में नारों से गूँज रहा है तो दूसरी और रायलसीमा और आंध्र क्षेत्रों में जगनमोहन रेड्डी के समर्थक सड़कों पर निकले हुए हैं .

राजनीतिक उठापटक

दरअसल राज्य में राजनीतिक उठापटक की स्थिति उसी समय शुरू हो गई थी जबकि दो वर्ष पहले मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी की हवाई दुर्घटना में मौत हो गई और उनकी जगह मुख्यमंत्री न बनाए जाने पर नाराज़ उन के पुत्र वाईएस जगनमोहन रेड्डी ने कांग्रेस के विरुद्ध बग़ावत कर दी.

कांग्रेस उस झटके से अब तक सँभल नहीं सकी है बल्कि यह संकट अब और भी गहरा गया है. इस तरह आंध्र प्रदेश इस समय चक्की के पाटों के बीच पिस रहा है. आशंका यह है की आने वाले चंद दिनों में हालात और भी ख़राब हो सकते हैं क्योंकि अलग राज्य के लिए आंदोलन चलाने वाली तेलंगाना संयुक्त संघर्ष समिति ने छह सितम्बर से अनिश्चित काल की आम हड़ताल का आह्वान किया है. इसमें न केवल सरकारी कर्मचारी बल्कि तेलंगाना के समाज के सभी वर्ग हिस्सा लेंगे.

समिति के संयोजक प्रोफ़ेसर कोदंदाराम का कहना है कि आन्दोलन का यह चरण अब उसी समय समाप्त होगा जबकि केंद्र सरकार तेलंगाना राज्य की स्थापना की घोषणा करेगी और उस का बिल संसद में पेश करेगी.

इससे राज्य की अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता और भी बढ़ गई है. राज्य के नागरिक विकास मंत्री महीधर रेड्डी का मानना है कि इन समस्याओं से आंध्र प्रदेश की ब्रांड वैल्यू ज़रूर प्रभावित हुई है क्योंकि उद्योग और व्यापार जगत में और पूँजी निवेशों में एक असुरक्षा की भावना बढ़ी है.

बंद और आंदोलन से नुक़सान

गत दो वर्षों के दौरान राज्य पर जो प्रभाव पड़ा है उसके बारे में आंध्र प्रदेश चैम्बर्स ऑफ़ कामर्स एंड इंडस्ट्री का कहना है कि राज्य को साठ हज़ार नौकरियों का नुकसान हुआ है और राज्य से कई बड़ी परियोजनाएँ और पूंजी निवेश के अवसर दूसरे राज्यों को चले गए हैं. एक वर्ष में कुल 17 बंद का आयोजन हुआ जिससे 6800 करोड़ का नुकसान हुआ.

राज्य विधान परिषद् के सदस्य अमीन जाफ़री ने स्थिति का आकलन करते हुए कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी की कंपनियों का निर्यात ठहर कर रह गया है क्योंकि तीन वर्षों में वह 32 हज़ार करोड़ रुपये से बढ़कर केवल 36 हज़ार करोड़ तक पहुँच पाया है. कई बड़ी आईटी कंपनियों ने अपनी परियोजनाओं को बढ़ाने के प्रस्ताव या तो स्थगित कर दिए हैं या फिर उन्हें दूसरे राज्यों को दे दिया गया है.

ठीक यही हाल फ़ार्मा यानी दावा बनाने वाले उद्योग का है. हैदराबाद के लिए यह एक बड़ा धक्का है क्योंकि हैदराबाद में माइक्रोसॉफ़्ट और गूगल जैसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के कार्यालय हैं और यह देश में आईटी उद्योग का एक बड़ा केंद्र रहा है. लेकिन दूसरी ओर समाचार पत्र टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संपादक किंशुक नाग कहते हैं की हालात की ख़राबी के लिए आंध्र प्रदेश को अलग-थलग करके देखन सही नहीं है क्योंकि पूरा देश ही राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक मंदी की मार सह रहा है.

उन्होंने कहा कि पड़ोसी राज्य कर्नाटक में तो मुख्यमंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद भी उन्होंने त्याग पत्र नहीं दिया था जिससे वहाँ भी राजनीतिक अनिश्चितता उत्पन्न हो गई थी. इसके अलावा अब तक अन्ना हज़ारे के आन्दोलन और सोनिया गाँधी की बीमारी से भी देश में हालात प्रभावित हुए हैं. इधर हालात की ख़राबी का असर आंध्र प्रदेश सरकार के राजस्व पर भी पड़ा है.

चंद्रबाबू नायडू की भूमिका

गत वर्ष वाणिज्य कर की वसूली अपने लक्ष्य से तीन सौ करोड़ रुपए कम रही. मंत्री महीधर रेड्डी का कहना है की सरकार का काम-काज तो ठीक ढंग से चल रहा है लेकिन बन्द और हड़तालों के कारण सरकार के राजस्व में कमी हुई है.

दूसरी ओर किंशुक नाग कहते हैं कि आंध्र प्रदेश में सभी राजनीतिक दल, जिनमें तेलंगाना राष्ट्र समिति भी शामिल है हैदराबाद की ब्रांड छवि का महत्व जानते हैं और उसे बिगड़ने से बचाना चाहते हैं. लेकिन साथ ही वह ये भी कहते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री चन्द्र बाबू नायडू ने हैदराबाद की छवि बनाने में और आंध्र प्रदेश के विकास के लिए 1995 से 2004 तक जो काम किया था उसकी कमी सभी महसूस कर रहे हैं.

उनका कहना था कि हैदराबाद को बनाने में दो व्यक्तियों का बड़ा हाथ था. “एक तो सातवें निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान और दूसरे नायडू, आज नायडू जैसे सुधार लाने वाले नेता की ज़रुरत है जो दूसरे राज्यों से पूँजी निवेश को आकर्षित कर सकते हैं." लेकिन अमीन जाफ़री का कहना है कि केवल व्यक्ति विशेष के कारण ही हालात बदल नहीं सकते बल्कि समस्याओं को हल करना ज़रूरी है.

उनका कहना है की अगर केंद्र सरकार और कांग्रेस का नेतृत्व तेलंगाना की समस्या को जल्द हल करता है तो हैदराबाद की ब्रांड इमेज को बचाया जा सकता है. लेकिन अब लाख टके का सवाल यही है कि बात चाहे तेलंगाना राज्य की मांग की हो या राजनीतिक स्थिरता बहाल करने की, इसके लिए कब ठोस कदम उठाए जाएंगे और कब हालात सामान्य हो सकेंगे.

आम राय यही है की तेलंगाना के मामले में केंद्र सरकार की टालमटोल की नीति और कांग्रेस के नेतृत्व की विफलता की आंध्र प्रदेश और हैदराबाद को एक भारी आर्थिक क़ीमत चुकानी पड़ रही है.


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