ईश्वर एक है तो दुनिया में 4000 से अधिक धर्म क्यों हैं?

2019-01-24T11:26:05Z

परमात्मा से जुड़ना भी बिल्कुल ऐसा ही है। हालांकि आप किसी भी नाम या रूप के द्वारा उनसे जुड़ सकते हैं लेकिन महत्वपूर्ण उनसे जुड़ना है।

हां, ईश्वर केवल एक है। वास्तव में, ईश्वर के अलावा और कुछ भी नहीं है। जब हम कहते हैं कि ईश्वर एक है, तो उसका यह अर्थ नहीं कि वे ऊपर कहीं स्वर्ग में या बादलों के बीच बैठे हैं। वास्तव में सत्य यह है कि ईश्वर के सिवाय और कुछ भी नहीं है। धर्म तो केवल ईश्वर को जानने और अनुभव करने का एक तरीका है, इसलिए उसकी संख्या अनंत हो सकती है। चूंकि ईश्वर अनंत हैं, इसलिए उन्हें जानने और अनुभव करने के तरीके भी अनंत हैं।

यहां ऋषिकेश में गंगा नदी के किनारे पानी में उतरने के कई अलग-अलग रास्ते हैं। कुछ आश्रमों में संगमरमर की सीढिय़ां हैं। कई घाटों में सीमेंट की सीढ़ियां हैं। इसके अलावा रेतीले तट भी हैं और यहां तक कि बड़ी चट्टानें भी हैं, जिनसे कूद सकते हैं। गंगा नदी में उतरने के सैकड़ों नहीं तो दर्जनों अलग तरीके हैं, लेकिन इससे फर्क नहीं पड़ता कि आप कैसे अंदर जाते हैं। मां गंगा न तो उन्हें विशेष प्राथमिकता देती हैं, जो चट्टानों से कूदते हैं और न ही उन्हें जो सीढ़ियों से उतरते हैं। महत्वपूर्ण तो पानी में उतरना है।

परमात्मा से जुड़ना भी बिल्कुल ऐसा ही है। हालांकि आप किसी भी नाम या रूप के द्वारा उनसे जुड़ सकते हैं, लेकिन महत्वपूर्ण उनसे जुड़ना है। उदाहरण के तौर पर, एक आदमी महज एक ही दिन में अलग-अलग पोशाकें पहनता है, अलग-अलग नामों से जाना जाता है और अलग-अलग भूमिकाएं निभाता है। जहां कार्यक्षेत्र में वह सूट-टाई पहनता है और लोग उसे मि. पटेल कहते हैं, वहीं घर आने पर वह धोती-कुर्ता पहनता है। उसकी पत्नी उसे प्रिय कहती है, बच्चे पिता बुलाते हैं। टेनिस खेलने जाता है तो फिर कपड़े बदलता है, दोस्त उसे विवेक कहते हैं जबकि माता-पिता बेटा कहकर पुकारते हैं।

एक आदमी, एक दिन, इतने सारे नाम, कपड़े और रिश्ते। अब ईश्वर की कल्पना करें कि पूरे इतिहास में अरबों लोग उनसे रिश्ता जोड़ते आ रहे हैं। ईश्वर के साथ आपकी अनंत भूमिकाएं, नाम और रिश्ते हो सकते हैं, लेकिन मायने यह रखता है कि आप उनसे जुड़ें। जिस तरह मां गंगा यह ध्यान नहीं देतीं कि आप उनके जल में कैसे समाए, वैसे ही भगवान भी बस यह चाहते हैं कि आप उनसे जुड़ें। किसी भी नाम से, किसी भी रूप में, किसी भी तरीके से या फिर किसी नाम और रूप के बिना।

— साध्वी भगवती सरस्वती

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