फीकी पड़ी मणि की चमक विरासत पर लगा ग्रहण

2017-02-20T07:40:12Z

- गोरखपुर से महराजगंज तक होती रही चर्चा

- जेल में बंद अमरमणि का छीन गया चैन सुकून

GORAKHPUR: सारा मर्डर कांड में अमनमणि के खिलाफ सीबीआई अदालत में चार्जशीट दाखिल होने की चर्चा रविवार को गोरखपुर से लेकर महराजगंज तक रही। महराजगंज जिले की लक्ष्मीपुर विधानसभा सीट से राजनीतिक फलक पर रोशन मणि परिवार की चमक फीकी पड़ने की आशंका से उनके समर्थकों के चेहरे कुम्हलाए नजर आए। विधानसभा चुनाव के ऐन वक्त पर सीबीआई की चार्जशीट फाइल करने की खबर को लेकर भी बहस छिड़ी रही।

कहा जा रहा है कि अमनमणि पर दोष साबित होते ही परिवार की राजनीतिक विरासत खत्म हो जाएगी। बेटे के खिलाफ चार्जशीट फाइल होने की जानकारी से जेल में बंद अमरमणि की बेचैनियां बढ़ गई हैं। जेल से जुड़े लोगों का कहना है कि बेटे के फ्यूचर की टेंशन में पूर्व मंत्री का चैन छीन गया है। संयोग की बात यह है कि मधुमिता और सारा का मर्डर नौ तारीख को ही हुआ है। लोग इसे भी अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं।

पिता की राह चला बेटा, कौन संभालेगा विरासत

सारा मर्डर के आरोपित अमनमणि के खिलाफ शनिवार को सीबीआई कोर्ट ने चार्जशीट फाइल कर दी थी। चार्जशीट में अमनमणि को सारा मर्डर का दोषी बताया गया है। आरोप पत्र दाखिल होने से अमरमणि परिवार से जुड़े लोगों के बीच मायूसी छा गई है। रविवार को गोरखपुर से लेकर नौतनवां तक अमनमणि के कसूरवार और बेकसूर होने को लेकर चर्चा छिड़ी रही। यह भी कहा जा रहा है कि कवियित्री मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में अमरमणि को पुलिस ने अरेस्ट किया था। बाद में उनको कोर्ट से सजा हो गई। मधुमिता हत्याकांड के बाद से अमरमणि परिवार पर विपत्तियों का साया छाया हुआ है। राजनीतिक हैसियत भी बेहद कमजोर पड़ने लगी है। नौ जुलाई 2015 को सारा मर्डर का आरोप अमनमणि पर लगने के बाद से अमरमणि परिवार दोबारा सुर्खियों में आ गया। उनके परिवार की राजनीतिक विरासत संभालने का संकट खड़ा हो गया। मधुमिता शुक्ला मर्डर में जेल जाने के बाद 2009 में अमरमणि ने अपने भाई अजीतमणि को टिकट दिलवाया। लेकिन वह चुनाव नहीं जीत सके। 2012 के विधानसभा चुनाव में अमनमणि ने नौतनवां विधानसभा क्षेत्र से पर्चा भरा। लेकिन जनता ने उनको नकार दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में अमरमणि के परिवार को टिकट नहीं मिला। 2015 में फरेंदा में हुए उप चुनाव में अमरमणि के चाचा पूर्व मंत्री श्यामनारायण तिवारी का टिकट काट दिया था।

अमरमणि का फ्लैश बैक

09 मई 2003: लखनऊ के पेपर मिल कॉलोनी में कवियित्री मधुमिता शुक्ला की गोली मारकर हत्या

17 जून 2003: पुलिस के हाथ से सीबीआई को मामला ट्रांसफर, लखनऊ से जांच उत्तराखंड ट्रांसफर

24 अप्रैल 2007: नैनीताल हाईकोर्ट ने अमरमणि, उनकी पत्‍‌नी मधुमणि सहित चार को आजीवन कारावास की सजा दी।

27 फरवरी 2013: अमरमणि त्रिपाठी को गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में एडमिट कराया गया।

13 मार्च 2013: अमरमणि की पत्‍‌नी मधुमिता भी बीआरडी में भर्ती हुई।

11 दिसंबर 2013: अमरमणि और उनकी पत्‍‌नी मधुमणि को गोरखपुर मंडलीय कारागार में शिफ्ट ि1कया गया।

मधुमिता मर्डर के बाद मंडराती रही मुसीबतें

अमरमणि परिवार से जुड़े लोगों का कहना है क मधुमिता शुक्ला हत्याकांड के बाद से अमरमणि के परिवार पर संकटों का बादल गहराता गया। गोरखपुर के दुर्गाबाड़ी स्थित आवास का मामला तेजी से उभरा। अवैध ढंग से कब्जा कर मकान बनाने का मुकदमा अमरमणि का पक्ष हार गया। कोर्ट ने भूमि खाली करने का आदेश दिया तो एक बड़े नेता की मदद से वह अपना मकान बचाने में कामयाब हुए। लेकिन मकान की कीमत बाजार दर पर चुकानी पड़ी। एक अन्य मामले में कोर्ट के आदेश पर महराजगंज जिले के नौतनवां स्थित ऑफिस से कब्जा हटवा दिया गया। फोर्स ने अमरमणि के दफ्तर को तोड़वाते हुए वादी को कब्जा दिला दिया।

80 दशक में एक बाहुबली ने बनाया नेता

पूर्व मंत्री अमरमणि की राजनीतिक इंट्री 1980 में बताई जाती है। गोरखपुर के एक बाहुबली नेता की टीम में जुड़कर अमरमणि ने अपना वर्चस्व दिखाया। तत्कालीन लक्ष्मीपुर विधानसभा क्षेत्र से वीरेंद्र प्रताप शाही के सक्रिय होने की वजह से गैंगवार भी खूब हो रहे थे। शहर से लेकर गांव तक हर जगह दो गोल के बीच गोलीबारी आम बात थी। तब इलेक्शन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सिंबल से अमरमणि चुनाव लड़े। इसके बाद कई दलों के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए आगे बढ़ते चले गए। कई बार विधायक रहने के बावजूद 2002 में वह विधानसभा चुनाव हार गए। गोरखपुर और आसपास क्षेत्रों में चर्चा है कि जिस बाहुबली के साथ अमरमणि ने राजनीतिक सफर शुरू किया था। उसका विरोध करने की कीमत अमरमणि परिवार चुका रहा है। हाल के दिनों में सपा से टिकट कटने पर अमनमणि ने बसपा से संपर्क साधा। लेकिन सालों से उसी पार्टी में गहरी पैठ रखने वाले कद्दावर नेता की वजह से अमनमणि की मांग को बसपा ने ठुकरा दिया।


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