जनाब अमजद सलीम ये शहर नहीं डरता

2012-06-18T12:52:33Z

Bareilly मूल घटना पर चलने से पहले जरा गौर करते हैं कि मेयर क्या होता है? ये सिलसिला असल में रोमन सभ्यता तक जाता है तब शहर के प्रथम नागरिक को अरबनेस प्रीफेक्टियस कहते थे ब्रिटिश लोकतांत्रिक व्यवस्था में ये प्रीफेक्ट हुआ माई प्रीफेक्ट कालांतर में मेयर बन गया ये महज शहर का पहला नागरिक नहीं होता ये अभिभावक होता है मुश्किलें दूर करता है मुश्किल हालात में साथ खड़ा होता है और रास्ता दिखाता है

आपका अखबार पिछले चार महीने से शहर की हर गली, हर दरवाजे पर वार्ड वॉच अभियान के तहत दस्तक देता रहा. आपसे पूछा कि किन हालात में आप जी रहे हैं? पाया कि बहुत मूलभूत सुविधाओं के लिए भी हम तरस रहे हैं. पीने का पानी हो, सफाई हो जाए, स्ट्रीट लाइट जल जाए...ऐसे रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े सवालों से ये शहर जूझता मिला और इसी क्रम में निकाय चुनाव के दौरान सिटी फस्र्ट हमारा एजेंडा बन गया. सबसे पहले मेरा शहर. मिली छतों के दूर तक सिलसिले, दिलों को जोड़ती गलियां और उनमें एक दूसरे से जुड़कर बसती जिंदगी. सबकी बहुत छोटी सी ख्वाहिश कि मुझे मूलभूत सुविधाएं दो. ये भूख, ये तड़प पहले भी थी. चुनाव दर चुनाव थी. उम्मीदों के साथ हम चुनते रहे, उम्मीदें खाक होती रहीं. सोचा कि इस बार चुनाव से पहले जरा ठोक-बजाकर देखा जाए कि किसके पास क्या है? हमारी कोशिश थी कि शहर का अभिभावक बनने की ताल ठोकने वालों से आप पूछें कि उनका एजेंडा क्या है? समस्याएं हमें पता हैं, उनका सॉल्यूशन किसके पास क्या है? तमाम उम्मीदवार जुटे, शहरी बड़ी उम्मीद लेकर पहुंचे, लेकिन कहते हैं, जिसके पास जो होता है, वो दिख जाता है. कांग्रेस के उम्मीदवार अमजद सलीम के पास क्या है, ये होटल डिप्लोमेट स्थित उस सभागार की दुर्गति में नजर आता है. इन जनाब के पास है विध्वंस, अराजकता, गुंडागर्दी, तमंचे, हुड़दंगी. अमजद जी और उन जैसे बहुत से लोगों को ये मुगालता है कि हमारी डेमोक्रेसी अपाहिज है. इस शहर के लोगों को डराया जा सकता है. कोशिश उनकी यही थी कि विकास की बात न हो. ये न पूछा जाए कि किसके पास शहर की जनता की समस्याएं दूर करने के लिए क्या कार्ययोजना है. ये डर क्यों? ये कोशिश क्यों? शायद इसलिए कि अमजद सलीम के पास कोई कार्ययोजना, एजेंडा है ही नहीं. अमजद पहले इंसान नहीं हैं, जिन्हें ये मुगालता हुआ कि मारपीट, तोड़-फोड़ करके विकास की पुकार को खामोश किया जा सकता है. अमजद इस मामले में भी पहले शख्स नहीं हैं कि जो बंदूक के दम पर अखबार का मुंह बंद करने की कोशिश कर रहे हैं. शायद उन्हें नहीं पता कि ऐसी कोशिशें करने वालों का क्या हश्र होता आया है. कहते हैं, जब तोप हो मुकाबिल तो अखबार निकालो. कागज के पन्नों पर स्याही से छपी अखबारी इबारतों ने इतिहास के पन्ने बदल दिए, निजाम बदल दिए. अमजद सलीम को हम बताना चाहेंगे कि मीडिया उनकी धौंस, गुंडागर्दी से नहीं डरता. शहर के विकास का सवाल उठाना, मेयर बनने की हसरत पालने वाले से विकास का एजेंडा पूछना अगर गुनाह है, तो ये गुनाह हम रोज करेंगे. हमारा शहर भी जानता है कि उसे क्या चाहिए. हम छोटी-छोटी जरूरतों के लिए जूझते हैं, दिन-प्रतिदिन की समस्याओं से दो-चार होते हैं, लेकिन कायर नहीं हैं. अमजद सलीम जैसे लोग विकास की पुकार को अगर गुंडागर्दी, तमंचों के बल पर खामोश करने की कोशिश करेंगे, तो विकास की ये जिद, ये जज्बा और मजबूत होगा.
संपादक

आलोक सांवल



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