मौत की तरफ बढ़ रहे युवाओं के बहकते कदम

Updated Date: Sun, 27 Sep 2020 05:48 PM (IST)

रांची: राज्य के युवाओं के बहकते कदम सीधे मौत की तरफ बढ़ रहे हैं। नशे की लत के शिकार इन युवाओं को ना भविष्य की चिंता है ना वर्तमान का डर। आंकड़े बताते हैं कि झारखंड में नशे का कारोबार अपनी जडे़ं फैलाता जा रहा है। इसकी चपेट से युवा पीढ़ी जूझ रही है। शहरी इलाकों के आंकड़े तेजी से बढ़ रहे हैं लेकिन रूरल एरिया में स्थिति दिनोंदिन खराब होती जा रही है। 13 साल से लेकर 50 साल तक की उम्र के लोग नशे की गिरफ्त में हैं। शराब के नशे की गिरफ्त में आए मरीजों की संख्या सबसे ज्यादा है लेकिन गांजा, अफीम और डेंड्रॉइट जैसा नशा सोसायटी के लिए अभिशाप बनता जा रहा है। 15 से 25 साल के युवाओं में पाउडर, वीड, डेंड्राइट लेने का मामला सबसे ज्यादा पाया गया है। ब्राउन सुगर और कोकिन के मामले भी अस्पताल पहुंच रहे हैं।

दो नशामुक्ति केंद्रों की स्थिति

आंकड़ों की बात करें तो राजधानी में दो नशा मुक्ति केंद्र (डी एडिक्शन सेंटर) हैं। रिनपास और सीआइपी। रिनपास के नशा मुक्ति सेंटर पर इलाज के लिए हर दिन कम से कम 40 से 50 रोगी पहुंचते हैं। हालांकि, लॉकडाउन के कारण अभी ये नम्बर्स 10 से 20 पर सिमटा हुआ है। जबकि सीआइपी में यह आंकड़ा 30 के करीब है। दोनों को मिला लें तो सिर्फ रांची में इलाज के लिए आने वाले मरीजों की कुल संख्या 70-80 से ऊपर है। इसका मतलब कि एक माह में करीब 2500 से 3000 लोग नशे की लत से परेशान हो रहे हैं।

2018-19 में डेढ़ लाख मरीज

सिर्फ रिनपास में वर्ष 2018-19 में करीब डेढ़ लाख मरीजों ने ओपीडी में डॉक्टरों से परामर्श लिया है। जबकि करीब 896 मरीजों को एडमिट भी किया गया। वहीं, सीआईपी में परामर्श का आंकड़ा 80 हजार रहा, जबकि 600 के करीब मरीजों को वहां भी एडमिट किया गया।

शहर में चल रहा ये नशा

1. शराब

2. डेंड्राइट

3. ब्राउन शुगर

4. गांजा

5. चरस

6. स्मैक

7- अफीम

8- एलएसडी

युवाओं का पसंद है स्मैक व ब्राउन सुगर

नशे की चपेट में दूसरे शहरों के युवा सबसे ज्यादा हैं। रिनपास के आंकड़ों की मानें तो सबसे ज्यादा मामले धनबाद, गुमला, देवघर, चक्रधरपुर के इलाकों से आ रहेहैं। हालांकि, रांची के भी मरीजों की संख्या काफी तेजी से बढ़ रही है। छोटे शहरों या कस्बों से शराब या फिर गांजा का मामला आता है, लेकिन राजधानी रांची के युवा स्मैक और ब्राउन सुगर की चपेट में आ रहे हैं। आंकड़ों की मानें तो नशे की जड़ में फंसे 60 प्रतिशत मरीजों की उम्र 15 से 35 वर्ष की है।

नशे का फैलता कारोबार

झारखंड में नशे का कारोबार तेजी से फैल रहा है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों की मानें तो पिछले 5 सालों से गांजा सप्लाई के लिए ओडि़शा और झारखंड बड़े सेंटर बने हुए हैं। राज्य को कॉरिडोर की शक्ल देकर यहां से माल को दिल्ली, मुम्बई समेत अन्य महानगरों तक पहुंचाया और लाया जा रहा है।

हर साल बढ़ रहे बेड के नंबर

सीआइपी और रिनपास दोनों ही जगह एडिक्शन सेंटर में बढ़ती मरीजों की संख्या को देखते हुए बेड बढ़ाए जा रहे हैं। प्रबंधन की ओर से डी एडिक्शन सेंटर के लिए नई बिल्डिंग बनाई गई है जिसमें 100 से अधिक बेड हैं। दोनों अस्पतालों के एडिक्शन सेंटर में बेड की संख्या 400-500 के करीब हो चुकी है। इतने मरीजों का इलाज एक साथ किया जा सकता है।

ग्रुप बॉक्स।

रिनपास में डॉक्टर्स की भारी कमी

देशभर में रिनपास यानी रांची इंस्टीट्यूट ऑफ साइकियाट्री एंड अलायड साइंसेज मनोचिकित्सा के लिए अलग पहचान रखता है। यहां न केवल झारखंड बल्कि लगभग पूरे देश से मनोरोगी इलाज कराने आते हैं। यहां के ओपीडी में हर दिन लगभग 300 मरीज आते हैं। इन 300 मरीजों को देखने के लिए केवल 5 डॉक्टर ही हैं। यानी एक मरीज को देखने में एक डॉक्टर मात्र 7 मिनट 4 सेकेंड का समय दे सकता है।

परमानेंट दो व डिप्यूटेशन में चार डॉक्टर्स

राज्य सरकार द्वारा संचालित इस अस्पताल में महिला व पुरुष दो अलग-अलग वार्ड हैं। जहां 500 से अधिक मरीज इलाजरत हैं। इसके अलावा ओपीडी में हर दिन 300 के करीब महिला व पुरुष मरीज इलाज कराने आते हैं। लेकिन जिस अस्पताल में इतना दबाव है, वहां डॉक्टर्स की संख्या मात्र सात है। इन सात डॉक्टरों में महज दो ही रिनपास के परमानेंट डॉक्टर हैं।

ये है स्थिति

एक डॉ सुभाष सोरेन हैं, जो स्वयं निदेशक के प्रभार में हैं। इसके अलावा साइकियाट्री विभाग की एचओडी डॉ जयंती सिमलई हैं। इन दोनों के अलावा चार डॉक्टर डिप्यूटेशन में हैं। ये डॉ विनोद कुमार, डॉ अमित सिन्हा, डॉ सिद्धार्थ व डॉ अभिषेक हैं। इनके अलावा रिनपास से ही रिटायर डॉ पीके सिन्हा हैं, जिन्हें सरकार रिटायरमेंट के बाद रखी हुई है।

झारखंड में नशा अपना पैर फैला रहा है, यह चिंता का विषय है। हमारे यहां आने वाले मरीजों की संख्या से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। इसमें सबसे अधिक युवा शामिल हैं। छोटे शहर के मरीज भी ज्यादा हैं। भीड़ इतनी हो गई है कि हर साल बेड संख्या बढ़ाने का फैसला लिया जा रहा है।

-डॉ सुभाष, निदेशक, रिनपास

Posted By: Inextlive
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