रिसोर्स के मिसयूज से सूखने लगी है जमीन

2019-06-21T06:00:21Z

- लगातार हो रहा है ग्राउंड वॉटर का एक्सेस इस्तेमाल

- 50 परसेंट तक इस्तेमाल का मानक, 70 परसेंट तक हो जा रहा है यूज

- इसकी वजह से लगातार डाउन हो रहा है ग्राउंड वॉटर का लेवल

GORAKHPUR: देश-दुनिया पानी की किल्लत से जूझ रही है। देश में ही कई जगह पानी के लिए हाय-तौबा मची है। गोरखपुर में अभी यह हालात नहीं हैं, लेकिन गोरखपुराइट्स ऐसे हालात बना देना चाहते हैं। यह हम नहीं कह रहे हैं, बल्कि वॉटर पर हुई स्टडी में सामने आए आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं। गोरखपुर में जो भी वॉटर रिसोर्स अवेलबल हैं, उनका हम धड़ल्ले से मिसयूज कर रहे हैं। इन रिसोर्स से हम 70 फीसद तक इस्तेमाल कर डाल रहे हैं। वहीं इन रिसोर्स को रीचार्ज करने की बात की जाए, तो यह एक परसेंट से भी कम है। ऐसे में अब शहर के कई अहम इलाकों में जहां वॉटर लेवल नीचे आने लग गया है, तो वहीं दूसरी ओर पानी की किल्लत भी महसूस होने लगी है। अगर यही हाल रहा, तो आने वाले दिनों में हम पानी की भयंकर किल्लत से जूझेंगे और एक-एक बूंद के लिए हमें जंग लड़नी होगी।

15-20 परसेंट ही हो पा रहा रीचार्ज

मदन मोहन मालवीय यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के प्रोफेसर और एनवायर्नमेंटलिस्ट प्रो। गोविंद पांडेय की मानें तो गोरखपुर में मौजूद वॉटर रिसोर्स का अगर 50 परसेंट तक इस्तेमाल किया जाए, तो पानी की जबरदस्त किल्लत से हमें अभी नहीं जूझना पड़ेगा। मगर शहर की जो हकीकत है, वह काफी डरा देने वाली है। गोरखपुर में लोग 70 परसेंट तक वॉटर रिसोर्स का इस्तेमाल हो रहा है, जबकि बारिश और दूसरे रिसोर्स से महज 15 से 20 परसेंट तक ही रीचार्ज हो पा रहा है। यानि कि हर साल हम करीब रिसोर्स के करीब 50 फीसद पानी को बर्बाद कर दे रहे हैं। इसमें भी अगर बाढ़ के हालात हो गए, तो रीचार्ज परसेंट अच्छा हो जाता है, लेकिन बाकी दिनों में लोगों के लिए मुश्किलें बनी रहती है और वॉटर रिसोर्स का दोहन होता रहता है।

हैंडपंप भी नहीं दे रहे हैं साथ

गोरखपुर शहर की बात की जाए तो वॉटर सप्लाई के अलावा सिटी के 32 प्रतिशत हिस्से में पानी सप्लाई के लिए 3975 इंडियामार्का हैंडपंप लगाए गए हैं। इनकी औसत गहराई 90 से 120 फीट तक है। ज्यादातर हैंडपंप की पानी दूषित हो चुका है, सरकार सर्वे कराकर इंडिया मार्क-2 हैंडपंप को रीबोर कराया गया है, लेकिन इसके बाद भी यह शहरवासियों की प्यास बुझाने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं। वॉटर सप्लाई न होने की वजह से इन इलाकों में लोगों को प्यास बुझाने के लिए हैंडपंप का ही सहारा लेना पड़ रहा है। प्रो। गोविंद पांडेय की मानें तो 400 फीट या उससे नीचे जाने पर ही बेहतर पीने के लायक पानी मिल सकता है, लेकिन इसके लिए काफी पैसे खर्च करने पड़ेंगे। वहीं जो पानी 100 से 120 फीट पर मिल जा रहा है, अगर उन्हें ट्रीट कर न पिया जाए, तो इस पानी में आर्सेनिक और फ्लोराइड कॉन्संट्रेशन की मात्रा ज्यादा मिलेगी, जिसे बगैर ट्रीट किए नहीं इस्तेमाल किया जा सकता है। यही वजह है कि सरकारी महकमों में इसी मकसद से ट्यूबवेल लगवाकर पानी की सप्लाई की जाती है, ताकि लोगों को कम से कम पीने के लिए शुद्ध पानी मिल सके।

60 लाख लीटर शुद्ध पानी की जरूरत

2001 में जब सिटी की आबादी 6 लाख थी। इनको डेली कम से कम 21 लाख लीटर पानी की आवश्यता पड़ती थी। उस दौरान शहर के 50 फीसद इलाकों में जलकल से पानी सप्लाई की जाती थी। ऐसे में सिर्फ 3 लाख लोगों को ही मात्र 10.5 लाख लीटर शुद्ध पानी मिल पाता था। जलकल के वर्तमान आंकड़ों पर नजर डाले तो एक व्यक्ति को प्रति दिन 3.50 लीटर पीने के लिए पानी की जरूरत पड़ती है। महानगर की कुल आबादी 19 लाख के आसपास है। ऐसे में प्रति दिन करीब 60 लाख लीटर शुद्ध पानी की आवश्यकता पड़ेगी, जबकि जलकल विभाग डेली 30 लाख लीटर पानी ही उपलब्ध करा पा रहा है।

कागजों में कुछ, हकीकत कुछ

नगर निगम सीमा में वॉटर रिसोर्स की बात करें तो कागजों में करीब 200 कुएं मौजूद हैं, जबकि 150 से ज्यादा तालाब भी निगम ने दर्ज कर रखे है। लेकिन अगर इसकी हकीकत परखी जाए तो मामला बिल्कुल अलग है। हकीकत यह है कि वर्तमान समय में सिटी में शहर में ढूंढने के बाद बमुश्किल 42 कुएं मिल जाएंगे, जबकि तालाबों की तादाद 38 पर जाकर सिमट जाती है। इन्हीं 80 रिसोर्स पर पूरे शहर के पानी को संरक्षित करने की जिम्मेदारी है, जहां से ग्राउंड वॉटर रीचार्ज होगा और लोगों के घरों में भी पीने का पानी आसानी से मुहैया हो सकेगा।

गर्मियों में होगी थोड़ा परेशानी

वॉटर लेवल की बात करें तो कुछ इलाकों में गर्मी के दिनों में मानसून से ठीक पहले वॉटर लेवल नीचे चला जाता है, इस बार भी यह करीब 8 से 10 फूट तक नीचे चला गया है। इसकी वजह से यह 28 से 40 के बीच वैरी करेगा। जबकि हाल के दिनों में यह सिर्फ 28 से 30 फीट के आसपास है। 10 साल पहले की बात की जाए, तो भी वॉटर लेवल में ज्यादा चेंज नहीं आया है। तब वॉटर लेवल 28 की जगह 20 फीट के आसपास था, लेकिन उस दौरान लोगों को पीने के लिए शुद्ध पानी 40 फीट पर ही मिल जाता था, लेकिन अब यह 120 तक पहुंच गया है।

स्टैटिक्स - करंट 10 साल पहले

वॉटर लेवल - 28 से 40 20 से 25

पीने लायक पानी - 380 से 400 40 से 60

मिनी ट्यूबवेल - 400 से 500 120 से 200

बड़े ट्यूबवेल - 650 से ऊपर 400 से ऊपर

ऐसे भी हो सकता है बचाव

- वॉटर की वेस्टेज को कम करने के लिए अवेयरनेस प्रोग्राम चलाए जाएं

- घर-घर जाकर, नुक्कड़ नाटक, एड, पोस्टर और बैनर के थ्रू पानी के वेस्टेज को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

- नए बनने वाले सभी घरों में वॉटर रीचार्ज सिस्टम को मस्ट किया जाए, जिससे कि पानी को रीचार्ज करने में मदद मिले।

- पानी को री-साइकिल कर इसके वेस्टेज को और कम किया जा सकता है।

- रीसाइकिल पानी का इस्तेमाल गार्डन में पौधों को पानी देने के लिए इसका यूज कर सकते हैं। ग्रे वॉटर, जिसमें टॉयलेट वॉटर नहीं आता, उनको दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। टॉयलेट वॉटर में ऑर्गेनिक पॉल्युशन होता है, इसलिए इसको रीसाइकिल कर यूज नहीं किया जा सकता।

- घर में पानी के लिए जगह-जगह टैप और फिटिंग्स लगी रहती हैं। इनसे पहले काफी पानी वेस्ट होता था, लेकिन इन दिनों कंपनीज ने इनकी डिजाइन काफी चेंज कर दी है, जिससे कि 25 परसेंट तक पानी के वेस्टेज को कम किया जा सकता है।

- पानी वेस्टेज का एक बड़ा रीजन लीकेज भी होता है। अगर एक सेकेंड में एक ड्रॉप भी वेस्ट हो रही है, तो 2700 गैलन वॉटर पर इयर वेस्ट हो रहा है। टैप के वॉशर को रिपेयर कराकर इसे बचाया जा सकता है।

आमतौर पर 50 परसेंट तक ही वॉटर रिसोर्स का इस्तेमाल किया जाए, तो इससे नुकसान की संभावना कम होगी, लेकिन गोरखपुर की स्टडी में यह सामने आया है कि यहां 70 परसेंट तक वॉटर रिसोर्स का इस्तेमाल कर लिया जा रहा है। वहीं रीचार्ज बमुश्किल 20 परसेंट तक ही हो पा रहा है। इसमें बारिश के दौरान होने वाला रीचार्ज शामिल है। आर्टिफिशियल रीचार्ज की मात्रा एक परसेंट से भी कम है।

- प्रो। गोविंद पांडेय, एनवायर्नमेंटलिस्ट


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