महाशिवरात्रि 2019 भगवान शिव क्यों धारण करते हैं नाग त्रिशूल डमरू और चंद्रमा जानें इनका महत्व

2019-03-02T06:10:27Z

भगवान शिव का स्वरूप सभी देवताओं में अलग है और वही उनको सभी देवताओं से भिन्न भी बनाता है। भगवान शिव भोलेनाथ हैं सर्वज्ञ हैं अविनाशी हैं अजन्मे हैं। उन्होंने जो भी अपने शरीर पर धारण किया है उन सबका अपना एक विशेष महत्व है।

महाशिवरात्रि के दिन भक्त भगवान शिव को अपनी भक्ति से प्रसन्न कर देना चाहते हैं ताकि उनको शिव कृपा प्राप्त हो जाए और वो मोक्ष के भागी बन जाएं, जीवन—मरण के बंधन से मुक्त हो जाएं।

भगवान शिव का स्वरूप सभी देवताओं में अलग है और वही उनको सभी देवताओं से भिन्न भी बनाता है। भगवान शिव भोलेनाथ हैं, सर्वज्ञ हैं, अविनाशी हैं, अजन्मे हैं। उन्होंने जो भी अपने शरीर पर धारण किया है, उन सबका अपना एक विशेष महत्व है।    

महादेव के त्रिशूल के तीनों शूल का अर्थ 

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव विश्वकर्मा द्वारा ऋषि दधीचि की अस्थियों से तैयार पिनाक धनुष को धारण करते हैं और उनका जन्म नहीं हुआ था बल्कि वे सृष्टि के आरंभ में ब्रह्रानाद से प्रगट हुए थे। उसी समय उनके साथ रज, तम और सत गुण भी प्रगट हुए थे। शिव हाथ में जो त्रिशूल धारण करते हैं, उसके तीनों शूल इन्हीं तीन गुणों का प्रतीक हैं।

सुर, संगीत और लय का केंद्र है डमरू


सृष्टि के आरंभ से आनंदित शिव जी ने नृत्य आरंभ किया और उस समय 14 बार डमरू बजाया। उनके डमरू से निकली ध्वनि से ही व्याकरण और संगीत के छंद और लय-ताल का जन्म हुआ, इसलिए शिव के हाथ में सदैव डमरू रहता है।

भय से मुक्ति और संरक्षण का प्रतीक है नाग

शिवजी के गले में लिपटे नाग के बारे में पुराणों में स्पष्ट बताया गया है कि यह नागों के राजा नाग वासुकी हैं। वासुकी शंकर जी के परम भक्त थे, इसलिए उन्हें आभूषण की तरह गले में लिपट कर हमेशा भगवान के पास रहने का वरदान मिला था।

साथ ही यह एक संदेश भी है कि नाग जाने-अंजाने में मनुष्यों की सहायता ही करता है, फिर भी कुछ लोग डर कर या अपने निजी स्वार्थ के लिए नागों को मार देते हैं। इसलिए भगवान शिव नाग को गले में धारण कर ये संदेश देते हैं कि प्रकृति में हर प्राणी का अपना विशेष योगदान है और बिना वजह किसी प्राणी की हत्या न करें।

भक्ति और स्नेह का संयोग है चंद्रमा


शिवपुराण के अनुसार, प्रजापति दक्ष के श्राप से बचने के लिए चन्द्रमा ने भगवान शिव की घोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने उनके जीवन की रक्षा की और उन्हें अपने शीश पर धारण किया।

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, जब समुद्र मंथन किया गया और उसमें से विष निकला तो पूरी सृष्टि की रक्षा के लिए स्वयं भगवान शिव ने उसका पान कर लिया था। इसके बाद शिव जी का शरीर उसके प्रभाव से अत्यधिक गर्म होने लगा, जिसे देखकर चंद्रमा ने प्रार्थना की कि भोलेनाथ उन्हें माथे पर धारण कर लें ताकि विष का प्रभाव कम हो और उन्हें शीतलता का अनुभव हो।

शिव को लगा कि श्वेत और शीतल होने के कारण चंद्रमा विष की तीव्रता को सहन नहीं कर पाएंगे और इंकार कर दिया परंतु जब चंद्रमा सहित देवतागणों ने उनसे बार—बार निवेदन किया तो वे राजी हो गए। इस तरह चंद्रमा उनके मस्तक पर विराजमान हो गए।

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