गोरखपुर की मीनाक्षी ने दिया गॉड पार्टिकल का सुराग

2012-07-05T20:16:41Z

Gorakhpur जिस गॉड पार्टिकल के मिलने से आज पूरे विश्व के वैज्ञानिक काफी उत्साहित हैं उसे ढूंढने वाली टीम मेम्बर्स में एक नाम गोरखपुर का भी है यह नाम है प्रो मीनाक्षी नारायण वह दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर यूनिवर्सिटी की एल्यूमनाई हैं इन्होंने 1982 में डीडीयू से बीएससी की और गोल्ड मेडल पाया उनके पिता पीएन श्रीवास्तव गोरखपुर के फेमस साइंस कॉलेज महात्मा गांधी पीजी कालेज के प्रबंधक हैं और चारू चंद्र पुरी के निवासी अपने 5 भाई बहनों में वह दूसरे नंबर पर हैं उन्‍हें इस बात की काफी खुशी है कि उनके फादर पीएन श्रीवास्तव इस समय उनके साथ हैं पेश हैं आई नेक्स्ट रिपोर्टर शैलेष अरोरा से प्रो मिनाक्षी नारायण की टेलीफोन पर हुई बातचीत के खास अंश

इस पार्टिकल के मिलने के बाद अब आप लोगों का अगला कदम क्या होगा?
सबसे पहले हम यह देखेंगे कि यह स्टैंडर्ड मॉडल से कंपैटिबल है या नहीं. यह हिग्स बोसोन ही है या कोई और पार्टिकल है. इसके बाद हम लोग इस पार्टिकल का अन्य पार्टिकल्स से इंटरेक्शन देखेंगे. इसी आधार पर हम लोगों का एक्सपेरिमेंट आगे बढ़ेगा.
अगर यह हिग्स बोसोन पार्टिकल नहीं होगा तो भी क्या यह उतना ही हेल्पफुल होगा, जितना अभी उम्मीद की जा रही है?
डेफिनेट्ली, अगर यह कोई और पार्टिकल है तो भी यह ब्रह्मंड के रहस्य खोलने में सहायक होगा. ब्रह्मंड में बहुत से पार्टिकल्स हैं. जितनी भी जानकारी होती जाएगी, वह आगे काम आएगी. इससे ब्रह्मांड में मौजूद अन्य पार्टिकल्स को ढूंढने में भी हेल्प होगी.
अगर यह स्टैंडर्ड मॉडल से कंपैटिबल नहीं होता है तो आगे की क्या योजना होगी?
इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा. अगर यह कंपैटिबल होता है तो ठीक है, नहीं तो ऑल्टरनेट थ्योरी (मॉडल) तैयार होगी. ओवरऑल इस पार्टिकल के मिलने से हमें डिफरेंट मास के बारे में जानकारी होगी. क्योंकि किसी भी चीज का निर्माण मास से ही होता है. ब्रह्मंड की उत्पत्ति से पहले क्वार्क, इलेक्ट्रान में मास नहीं था. बाद में इनके इर्द गिर्द एक फील्ड बनी जिसके बाद कुछ रिएक्शन्स होने से उनमें मास आया और सभी चीजों की उत्पत्ति हुई.
इस पार्टिकल को मिलने में कितना समय लगा?
पिछले 50 सालों से इस पार्टिकल की खोज चल रही थी. लगभग 3000 साइंटिस्ट्स द्वारा किए जा रहे इस सीएमएस एक्सपेरिमेंट की यह फाइंडिंग्स बताती हैं कि हम लोग का एक्सपेरिमेंट सही दिशा में चल रहा है.

Video: कैसी थी स्टूडेंट मीनाक्षी

शुरू से ही ब्रिलिएंट रही प्रो. मीनाक्षी
प्रो. मीनाक्षी नारायण की इस सफलता से गोरखपुर यूनिवर्सिटी का हर टीचर इस समय काफी खुश है. 1982 में बीएससी कम्प्लीट करने के बाद प्रो. मिनाक्षी आईआईटी कानपुर से एमएससी करने चली गई. एमएससी फस्र्ट इयर में उनको मेरिट फार एकेडमिक प्रॉफिशिएंसी के लिए सर्टिफिकेट मिला तो फाइनल इयर (1984) में बेस्ट आउटगोइंग स्टूडेंट का प्राइज. इसके बाद वह पीएचडी करने स्टोनी ब्रूक यूनिवर्सिटी, न्यूयार्क गईं और वहीं बस गईं.
 
अप्रैल में ही जताई थी संभावना
30 अप्रैल, 2012 को प्रो. मीनाक्षी डीडीयू के स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में यहां अपना व्याख्यान देने भी आई थीं. उसी समय उन्होंने इस बात का अंदेशा जताया था कि जल्द ही वैज्ञानिक ऐसे पार्टिकल की खोज कर लेगी जिससे ब्रह्मांड की उत्पत्ति के रहस्यों से पर्दा उठ सकेगा. हालांकि तब किसी को भी यह उम्मीद नहीं थी कि उनकी यह बात इतनी जल्दी सच हो जाएगी.
 
मीनाक्षी को मैंने भी पढ़ाया है. वह काफी अच्छी स्टूडेंट थी. उनकी इस उपलब्धि से डीडीयू के अन्य स्टूडेंट्स भी मोटिवेट होंगे. हाल ही में जब वह गोरखपुर यूनिवर्सिटी आई तो उन्होंने कहा था कि वह कुछ ऐसा अरेंजमेंट करेंगी जिससे यहां के स्टूडेंट्स को विदेश में रिसर्च और इंटर्न का मौका मिले.
प्रो. डीसी श्रीवास्तव, एचओडी फिजिक्स डिपार्टमेंट, डीडीयू
 
बीएससी में मीनाक्षी मेरी स्टूडेंट रही. वह शुरू से ही काफी ब्रिलिएंट थी. उसमें हर चीज को जानने की क्यूरिऑसिटी रहती थी. मैंने ही उसे यह सजेशन दिया था कि आईआईटी कानपुर से एमएससी करे. उसकी इस उपलब्धि ने सिर्फ गोरखपुर यूनिवर्सिटी ही नहीं बल्कि पूरे भारत का नाम ऊंचा किया है.
प्रो. राधे मोहन मिश्र, एक्स वीसी एंड हेड फिजिक्स डिपार्टमेंट, डीडीयू
 
यह हमारे लिए फक्र की बात है कि डीडीयू की एल्यूमनाई इस प्रोजेक्ट में शामिल है. हाल ही में वह गोरखपुर यूनिवर्सिटी के स्थापना दिवस पर यहां आई थीं. उनकी यह सफलता अन्य स्टूडेंट्स के लिए मार्गदर्शन का काम करेगी.
प्रो. पीसी त्रिवेदी, वीसी, डीडीयू
 
इस पार्टिकल का असली नाम हिग्स बोसान पार्टिकल है. इस सफलता से यह कहा जा सकता है कि स्टैंडर्ड मॉडल थ्योरी 99.99 परसेंट सही है. इसके अनुसार हिग्स बोसान पार्टिकल का मास एक रेंज के अंदर होता है. अब इसकी सहायता से कई अन्य रहस्य खुलेंगे.
गौहर रजा, साइंटिस्ट (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, टेक्नोलॉजी एंड डेवलपमेंट स्टडीज)


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