498ए की मार टूट रहे हैं कई परिवार

2015-06-21T02:01:59Z

--498ए का केस पुरुषों की गले का बन रहा फांस

--घरेलू हिंसा के आरोप में बर्बाद हो रहे कई परिवार

RANCHI: कहने को भारत पुरुष प्रधान देश हैं। लेकिन सिर्फ रांची में ही कई ऐसे पुरुष हैं जो न्याय की तलाश में सालों से भटक रहे हैं। उनका गुनाह सिर्फ इतना कि उनकी पत्‍ि‌नयों ने उन पर घरेलू हिंसा का इल्जाम लगाया है। इस चक्कर में न सिर्फ उनपर सेक्शन 498ए के तहत केस चल रहा है, बल्कि उनकी खुद की जिंदगी के साथ-साथ परिवार की जिंदगी भी तबाह हो गई है। किसी की अच्छी सैलरी वाली नौकरी चली गई, तो किसी का घर छीन गया। किसी ने फाइट करते-करते मानसिक संतुलन खो दिया तो किसी ने हार कर सुसाइड करने का भी मन बना लिया। आखिरकार इस लड़ाई की कड़ी में ऐसे ही पुरुषों ने मिलकर फाइट बैक की ठानी और न सिर्फ खुद के लिए लड़ रहे बल्कि एक दूसरे को सेव इंडियन फैमिली, परित्राण के तहत जोड़ते हुए न्याय दिलाने का प्रयास भी कर रहे हैं।

झारखंड में भी हो पुरुष आयोग का गठन

21 जून को सेव इंडियन फैमिली परित्राण ने फादर्स डे पर पीडि़त पुरुषों को न्याय दिलाने की मांग की है। इस सिलसिले में ऑर्गनाइजेशन के लोग फिरायालाल चौक से लेकर जयपाल सिंह स्टेडियम तक प्रोटेस्ट मार्च निकालेंगे। कन्वेनर दीपम बनर्जी ने बताया कि इस प्रोटेस्ट मार्च के जरिए वे सरकार और कोर्ट से मांग करेंगे कि पति -पत्‍‌नी की लड़ाई में पिता से बच्चों को दूर न किया जाए। फादर्स डे के दिन कई फादर्स अपने बच्चों से नहीं मिल सकते क्योंकि उन पर सेक्शन 498ए या घरेलू हिंसा के खिलाफ मामला दर्ज होता है।

प्वाइंट टू बी नोटेड---

ये होंगी मांगे

- सेक्शन 498ए के मामले को लेकर केंद्र सरकार से मांग की जाएगी कि इसे बेलेबल बनाया जाए। तुरंत गिरफ्तारी न हो या परिवार को इसकी सजा न भुगतना पड़े।

- एंटीसिपेट्री बेल का प्रोविजन कोर्ट से मिले, ताकि निर्दोष लोगों की जिंदगी कोर्ट के आगे-पीछे करने और खुद को निर्दोष साबित करने में न बीते।

- पुरुष आयोग का गठन हो, जहां पुरुषों के ऐसे मामलों की सुनवाई हो। उन्हें न्याय मिल सके। अक्सर महिला थाने में पुरुषों से गलत व्यवहार किया जाता है। उनकी एक नहीं सुनी जाती। अक्सर पुरुषों को ही दोषी साबित कर दिया जाता है। इसलिए सेपरेट काउंसलिंग सेंटर भी बने।

डू यू नो का लोगो--

सुप्रीम कोर्ट ने दी है हिदायत

- इंडिया में आईपीसी 498 ए के बेधड़क दुरुपयोग को सुप्रीम कोर्ट ने भी गंभीरता से लिया है। उसने सभी राज्य सरकारों को अपने-अपने पुलिस अधिकारियों को हिदायत देने को कहा है। भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत मामला दर्ज होने पर स्वत: गिरफ्तारी नहीं करें, बल्कि पहले दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 41 में प्रदत्त मापदंडों के तहत गिरफ्तारी की जरूरत को लेकर संतुष्ट हों।


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