Dhokha!

2011-07-01T10:24:29Z

MBA में minimum eligibility marks से अधिक पर भी students को नहीं मिल रहा admissionuniversity दे रहा AICTE के नियमों को हवाला फार्म भरने के बाद बदले गए नियम

सुधा ने एसईई के इंट्रेंस एग्जाम में 847वीं रैंक लाकर टॉपर्स में नाम दर्ज कराया. मेहनत रंग लाई थी इसलिए परिवार वाले भी खुश थे कि अब उसको एमबीए करने के लिए गर्वनमेंट कॉलेज तो मिल ही जाएगा. मगर सुधा के सपने दो पल में चूर-चूर हो गए. 27 जुलाई को जब सुधा इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी डाक्यूमेंट वैरीफिकेशन के लिए पहुंची तो उसको यह कह कर वापस लौटा दिया गया कि उसे एडमिशन नहीं मिल सकता है. क्योंकि उसके ग्रेजुएशन में 50 परसेंट से कम माक्र्स हैं. ऐसा सिर्फ सुधा के साथ नहीं हुआ है बल्कि टेक्निकल यूनिवर्सिटी ने कई टॉपर्स का मैनेजर बनने का सपना चकनाचूर कर दिया है.
अचानक बदल गए नियम
इस बार एसईई का एग्जाम महामाया टेक्निकल यूनिवर्सिटी ने कराया था. लिहाजा वहां पर जो प्रास्पेक्टस तैयार किया गया. उसमें एमबीए में एडमिशन लेने की न्यूनतम अर्हता जरनल कैटेगरी के स्टूडेंट्स के लिए 40 परसेंट बताई और एससी एसटी कैंडीडेट्स के लिए यह अर्हता 35 परसेंट बताई गई. इसके बाद 40 परसेंट तक माक्र्स लाने वाले सैकड़ों कैंडीडेट्स ने फार्म भर डाला. इसमें कई स्टूडेंट्स ने तो एसईई में टॉप भी कर लिया. यहां तक एमबीए में थर्ड रैंक लाने वाली श्वेता के भी ग्रेजुएशन में 43 परसेंट माक्र्स हैं और टॉप करने के बाद भी वह अपने दाखिले के लिए यूनिवर्सिटी के चक्कर लगा रही है. यही नहीं एमबीए में अच्छी परफारमेंस देने वाली आकांक्षा और प्रज्ञा को भी इसी वजह से एडमिशन नहीं मिल पाया.
अब नियम का आया ख्याल
टेक्निकल यूनिवर्सिटी के अधिकारियों का कहना है कि एआईसीटीई ने एमबीए के लिए न्यूनतम अर्हता 50 परसेंट कर दी है. सुधा का कहना है कि जब वह डाक्यूमेंट वैरीफिकेशन के लिए पहुंची तब उसे इस नियम का पता चला. यही नहीं उस समय वहां पर कोई भी अधिकारी से सही से बात तक करने को तैयार नहीं था. सुधा बताती हैं कि वैरीफिकेशन और काउंसिलिंग के लिए जो फार्म उनको भरने के लिए दिया गया था, वह भी उनसे छीन लिया गया. अधिकारियों का कहना था कि तुम लोगों का एडमिशन नहीं हो सकता है.
पहले तय क्यों नहीं हुए नियम
एसईई में बेस्ट परफारमेंस देने वाली प्रज्ञा बताती हैं कि एआईसीटीई का जब नियम है कि ग्रेजुएशन में 50 परसेंट माक्र्स लाने वाले ही एमबीए में एडमिशन ले सकते हैं तो फिर यूनिवर्सिटी ने अपने प्रास्पेक्टस में 40 परसेंट क्यों प्रिंट कराया. अगर यह नियम बाद में आया था तो फिर यूनिवर्सिटी को इसका विज्ञापन देना चाहिए था. इससे स्टूडेंट्स कम से कम अपना समय तो बर्बाद नहीं करते. वही आकांक्षा का कहना था कि इसमें स्टूडेंट्स की कोई गलती नहीं है. इसके लिए सीधे तौर पर यूनिवर्सिटी ही जिम्मेदार है. इस संबंध में स्टूडेंट्स ने कुलपति प्रो. कृपाशंकर को एक ज्ञापन दिया है और एडमिशन देने की मांग की है.
पैसे और मेहनत दोनों गई
दिन रात की कड़ी मेहनत और पैसे यह दोनों खर्च करने के बाद स्टूडेंट्स ने टॉप तो कर लिया लेकिन उनकी इस मेहनत पर टेक्निकल यूनिवर्सिटी ने पानी फेर दिया. सुधा बताती हैं कि उन्होंने एसईई की तैयारी के लिए कोचिंग की थी. जहां पर साल भर तक उन्होंने जमकर मेहनत की और घर में भी रेगुलर स्टडी करती थीं. ताकि एसईई के जरिए एमबीए में बेस्ट कॉलेज मिल सके. मगर काउंसिलिंग के दिन पता चला कि टॉप करने के बाद भी उनको एडमिशन नहीं मिल सकता है. जिसकी वजह से सैकड़ों स्टूडेंट्स का फ्यूचर अंधेरे में चला गया है. वहीं रजिस्ट्रार यूएस तोमर का कहना है कि यह एआईसीटीई का नियम है. इसके लिए वह कुछ नहीं कर सकते हैं.

 


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