Movie review: पुराने दौर के अंदाज को बयां करने का एक सफल प्रयास Detective Byomkesh Bakshy

Updated Date: Fri, 03 Apr 2015 04:56 PM (IST)

बॉलीवुड निर्देश्‍ाक दिबाकर बनर्जी की फिल्‍म ब्‍योमकेश बख्‍शी रिलीज हो चुकी है. इस फिल्‍म की जैसे जैसे कहानी बढ़ती है वैसे ही एक आकर्षक और रोचक अहसास होता जाता है. कहानी दर्शकों को अपनी ओर खींचती सी प्रतीत होती है. इसके साधारण रहन से लेकर सामान्‍य जीवन के हाव भावों का संगम मिलेगा. निर्देशक दिबाकर बनर्जी ने जैसे आखों के सामने कलकत्‍ता के 30 के दशक के ट्रांसपोर्ट का वर्णन किया है. यह उस दौर के इतिहास का एक महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा है जब दूसरे वर्ल्‍डवार में लड़ाई ब्रिटिश रेजीडेंट तक पहुंच गयी थी.

बनर्जी की फिल्‍म डिटेक्‍िटव ब्‍योमकेश बख्‍शी का किरदार खास है, जो एक महान बंगाली लेखक की ओर से क्रियेट किया गया था. शरदहिंदू बंदोपाध्‍याय ही कोई इसका बहुत एथेंटिक हीरो नहीं है यह हममे से ही कोई एक है. जिसका दिमाग एक सामान्‍य इंसान से तेज चलता है. उसकी दिमाग की कोशिकायें काफी तेज चलती हैं. कुछ ही मिनट में वह किसी प्‍वाइंट का अवलोकन आसानी से करता है.इस रोल में बेहतरीन प्रदर्शन के साथ सुशांत सिंह राजपूत भी बिल्‍कुल फिट बैठते दिखायी दिये. सिर्फ इतना ही नहीं दिबाकर बनर्जी भी इस फिल्‍म में एक बंगाली के कैरेक्‍टर में दिखायी दिये. इस फिल्‍म में सफेद धोती और सिगरेट पीते दिखायी दिये हैं. इस जगह पर यह कहीं से ढुलमुल नहीं दिखते हैं.
टुकडों में बदलती चली गयी डिटेक्‍िटव ब्‍योमकेश बख्‍शी अपने सहपाठी दोस्‍त अजीत बंदोपध्‍याय (आनंद तिवारी)के पिता के गुमशुदा के मामले को सुलझाते हैं. इस दौरान वह कई पुराने दबे राजों से और खतरनाक गैंगों से टकराते हैं. ब्‍योम केश अपने इस मिस्‍ट्री की गुत्‍थी को सुलझाने में फिर भी जुटे रहते हैं और वह इसमें कामयाब भी होते हैं. हालांकि फिल्‍म में गुत्‍थी सुलझाते हुये फिल्‍म कई जगहों पर टुकडों में बदलती चली गयी, कहीं पर कैरेक्‍टर तो कहीं पर भाषा और दौर को लेकर. हालांकि फिल्‍म के प्रभावशाली डॉयलाग कहानी को बाधंने में काफी मददगार साबित होते हैं.
एनर्जी और इंट्रेस्‍ट की कमी दिबाकर बनर्जी ने डिटेक्‍िटव ब्‍योमकेश बख्‍शी को कैरेक्‍टर को काफी मजबूत और विश्‍वास से भरा बनाया. जिससे इसकी लाइफ में कल्‍पनाओं के आधार पर कई बार बड़ी बड़ी योजनायें बनती जाती हैं. हालांकि यह एक लाइफ के लिये सफीसियेंट नहीं हैं. यह एक पुरूष की चरित्र के मजबूत आधार के लिये काफी नहीं हैं. खैर फिल्‍म की कहानी कैसी भी हो लेकिन यह इसके कुछ बिलिऐंट पीसेस इसे स्‍टॉन्‍ग बनाते है, जिससे फिल्‍म एक इंटरेस्‍ट क्रियेट करती दिखी. इसके डिस्‍क्रेडिट में कहानी कहने और उसके कुछ आत्‍म भोग के सकेंत हैं. करीब पहले आधे घंटे में फिल्‍म काफी इंटरेस्‍िटंग होती है जो दर्शकों बांधे रखती है, लेकिन सेकेंड पार्ट में फिल्‍म एनर्जी और इंट्रेस्‍ट दोनों की ही कमी दिखती है.
हिंदी फिल्‍मों में डेब्‍यू किया वहीं दिबाकर बनर्जी को किरदारों के चुनाव का क्रेडिट जाता है. हर कलाकार ने अपनी भूमिका में अच्‍छा प्रदर्शन किया. लीडिंग कैरेक्‍टर सुशांत सिंह के साथ ही नीरज काबी भी काफी कनिविंसिंग परफार्मेंस में दिखे. केवल बंगाली अभिनेत्री स्‍वास्‍तिका मुखर्जी ने इस फिल्‍म से हिंदी फिल्‍मों में डेब्‍यू किया. वह थोड़ा ज्‍यादा ही अपने कैरेक्‍टर अंगूरी देवी में मेहनत करती दिखीं, लेकिन यह कतई न भूलें कि दिबाकर बनर्जी ने इस फिल्‍म के जरिये एक शानदार पेशकश की है. उन्‍होंने छायाकार निकोलस एंड्रितसकिस के साथ इस जादुई संसार के पिछले दौर का बेहतर प्रदर्शन किया है.

सुशांत सिंह बिल्‍कुल फिट
बनर्जी की फिल्‍म डिटेक्‍िटव ब्‍योमकेश बख्‍शी का किरदार खास है, जो एक महान बंगाली लेखक की ओर से क्रियेट किया गया था. शरदहिंदू बंदोपाध्‍याय ही कोई इसका बहुत एथेंटिक हीरो नहीं है यह हममे से ही कोई एक है. जिसका दिमाग एक सामान्‍य इंसान से तेज चलता है. उसकी दिमाग की कोशिकायें काफी तेज चलती हैं. कुछ ही मिनट में वह किसी प्‍वाइंट का अवलोकन आसानी से करता है.इस रोल में बेहतरीन प्रदर्शन के साथ सुशांत सिंह राजपूत भी बिल्‍कुल फिट बैठते दिखायी दिये. सिर्फ इतना ही नहीं दिबाकर बनर्जी भी इस फिल्‍म में एक बंगाली के कैरेक्‍टर में दिखायी दिये. इस फिल्‍म में सफेद धोती और सिगरेट पीते दिखायी दिये हैं. इस जगह पर यह कहीं से ढुलमुल नहीं दिखते हैं.

Detective Byomkesh Bakshy!
U/A; Suspense/Thriller
Director: Dibakar Banerjee

Cast: Sushant Singh Rajput, Anand Tiwari, Swastika Mukherjee


टुकडों में बदलती चली गयी
डिटेक्‍िटव ब्‍योमकेश बख्‍शी अपने सहपाठी दोस्‍त अजीत बंदोपध्‍याय (आनंद तिवारी)के पिता के गुमशुदा के मामले को सुलझाते हैं. इस दौरान वह कई पुराने दबे राजों से और खतरनाक गैंगों से टकराते हैं. ब्‍योम केश अपने इस मिस्‍ट्री की गुत्‍थी को सुलझाने में फिर भी जुटे रहते हैं और वह इसमें कामयाब भी होते हैं. हालांकि फिल्‍म में गुत्‍थी सुलझाते हुये फिल्‍म कई जगहों पर टुकडों में बदलती चली गयी, कहीं पर कैरेक्‍टर तो कहीं पर भाषा और दौर को लेकर. हालांकि फिल्‍म के प्रभावशाली डॉयलाग कहानी को बाधंने में काफी मददगार साबित होते हैं.


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एनर्जी और इंट्रेस्‍ट की कमी
दिबाकर बनर्जी ने डिटेक्‍िटव ब्‍योमकेश बख्‍शी को कैरेक्‍टर को काफी मजबूत और विश्‍वास से भरा बनाया. जिससे इसकी लाइफ में कल्‍पनाओं के आधार पर कई बार बड़ी बड़ी योजनायें बनती जाती हैं. हालांकि यह एक लाइफ के लिये सफीसियेंट नहीं हैं. यह एक पुरूष की चरित्र के मजबूत आधार के लिये काफी नहीं हैं. खैर फिल्‍म की कहानी कैसी भी हो लेकिन यह इसके कुछ बिलिऐंट पीसेस इसे स्‍टॉन्‍ग बनाते है, जिससे फिल्‍म एक इंटरेस्‍ट क्रियेट करती दिखी. इसके डिस्‍क्रेडिट में कहानी कहने और उसके कुछ आत्‍म भोग के सकेंत हैं. करीब पहले आधे घंटे में फिल्‍म काफी इंटरेस्‍िटंग होती है जो दर्शकों बांधे रखती है, लेकिन सेकेंड पार्ट में फिल्‍म एनर्जी और इंट्रेस्‍ट दोनों की ही कमी दिखती है.


हिंदी फिल्‍मों में डेब्‍यू किया
वहीं दिबाकर बनर्जी को किरदारों के चुनाव का क्रेडिट जाता है. हर कलाकार ने अपनी भूमिका में अच्‍छा प्रदर्शन किया. लीडिंग कैरेक्‍टर सुशांत सिंह के साथ ही नीरज काबी भी काफी कनिविंसिंग परफार्मेंस में दिखे. केवल बंगाली अभिनेत्री स्‍वास्‍तिका मुखर्जी ने इस फिल्‍म से हिंदी फिल्‍मों में डेब्‍यू किया. वह थोड़ा ज्‍यादा ही अपने कैरेक्‍टर अंगूरी देवी में मेहनत करती दिखीं, लेकिन यह कतई न भूलें कि दिबाकर बनर्जी ने इस फिल्‍म के जरिये एक शानदार पेशकश की है. उन्‍होंने छायाकार निकोलस एंड्रितसकिस के साथ इस जादुई संसार के पिछले दौर का बेहतर प्रदर्शन किया है.

Courtesy by Mid Day
Hindi News from Bollywood News Desk

 

 

Posted By: Satyendra Kumar Singh
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