Netaji Subhash Chandra Bose Jayanti: कुछ ऐसे रहस्य बनकर रह गई सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु

Subhash Chandra Bose Jayanti 2020 लगभग 50 वर्षों तक यह एक विवादास्पद मुद्दा रहा है कि क्या नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने नवंबर 1944 में रूसी सरकार को कोई पत्र भेजा था। इसके अलावा उनके उनकी माैत भी रहस्य बन कर रह गई। अाइए उनकी जयंती पर जानें इन रहस्यों के बारे में...

Updated Date: Thu, 23 Jan 2020 12:17 PM (IST)

कानपुर (राम किशोर बाजपेयी)। Subhash Chandra Bose Jayanti 2020 लगभग 50 वर्षों तक यह एक विवादास्पद मुद्दा रहा है कि क्या नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने नवंबर 1944 में रूसी सरकार को कोई पत्र भेजा था। आजाद हिंद फौज के सूत्रों का दावा था कि नेताजी ने टोक्यो में रूसी राजदूत याकूब मलिक के माध्यम से तत्कालीन रूसी सरकार को एक पत्र भेजा था और इसी के आधार पर द्वितीय विश्व युद्ध में जापान के समर्पण के बाद नेताजी ने रूस जाने की योजना बनाई थी। तथाकथित विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु न मानने वाले खोजी लेखकों एवं जांच-समितियों ने जब रूसी सरकार के इस पत्र के संदर्भ में जानकारी चाही, तो उन्हें उत्तर मिला कि रूसी सरकार को ऐसा कोई पत्र नहीं मिला।रूसी सरकार के लिए पत्र भी
वहीं जब रूसी सरकार को अवगत कराया गया कि नवंबर 1944 में अपनी टोक्यो यात्र के दौरान नेताजी ने रूसी राजदूत से भेंट की थी और रूसी सरकार के लिए पत्र भी सौंपा था। तब इस विवरण के बाद रूसी सरकार ने यह तो माना कि नेताजी एक पत्र देना चाहते थे, लेकिन रूसी राजदूत द्वारा उसी समय बिना लिफाफा खोले वह पत्र नेताजी को लौटा दिया गया था। विमान दुर्घटना और नेताजी की मृत्यु को नकारने वालों के लिए रूसी सरकार की यह प्रतिक्रिया हतोत्साहित करने वाली थी। उनकी दृष्टि से इसका कारण यह भी हो सकता था कि जोजफ स्टालिन ने उनको कैद में रखा हो और इसे छिपाने के लिए रूसी सरकार पत्र पाने से मुकर रही हो।दस्तावेज सार्वजनिक कर दिए


पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में गोर्बाचोव फाउंडेशन ने नेताजी से जुड़े कुछ दस्तावेज सार्वजनिक कर दिए। इनमें 1941-45 की अवधि में सोवियत संघ, जर्मनी तथा इटली के काबुल स्थित दूतावासों की उन गतिविधियों का विवरण था, जब नेताजी गुपचुप रूप से भारत से जर्मनी चले गए थे। ये दस्तावेज यद्यपि भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार तक पहुंचाए जा चुके थे, लेकिन इसकी जानकारी शोधार्थियों को तब हुई जब द सर्च कार नेताजी : न्यू फाइडिंग्स की लेखिका डाॅ. पुराबी राय ने इस तथ्य का उद्घाटन किया। डाॅ. पुराबी राय ने मुखर्जी आयोग के समक्ष एक विस्तृत शपथ पत्र प्रस्तुत करके अनेक भारतविद रूसी शोधार्थियों का उल्लेख किया है। इनमें से एक विक्टर तुरादभेव भी है। तुरादभेव एशिया व अफ्रीका नामक रूसी भाषा की द्वैमासिक पत्रिका के उप सम्पादक भी रहे हैं। अपनी पत्रिका में 1993 में एक लेख लिखा, जिसका शीर्षक था- द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सुभाषचंद्र बोस किसके विरुद्ध लड़े थे।

रहस्यों से पर्दा उठ सकता हैये स्थितियां स्पष्ट करती हैं कि नेताजी और रूस से उनके संबंध घनिष्ठ थे। यदि रूसी अभिलेखागारों के दस्तावेज जो नेताजी से संबंधित हैं, सार्वजनिक किए जाएं या शोधार्थियों को उनका अध्ययन करने की अनुमति दी जाए, तो उन रहस्यों से पर्दा उठ सकता है। इस संदर्भ में भारत सरकार की ओर से पहल की अपेक्षा है, क्योंकि रूसी अभिलेखागारों में भारत सरकार की अनुमति से ही शोधार्थी उन दस्तावेजों का अध्ययन कर सकते हैं, जो नेताजी से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संबंधित हैं।editor@inext.co.in

Posted By: Shweta Mishra
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