न उम्र की सीमा ना जाति का बंधन

2018-08-05T06:00:10Z

कांवड़ यात्रा में दिख रही इंसानियत और भक्ति की मिसाल

जाति और भेदभाव को भी मिटाने का संदेश दे रही कांवड़ यात्रा

Meerut। शहर में कांवड़ यात्रा के अलग-अलग रंग देखने को मिल रहे हैं। बाबा भोलेनाथ का जलाभिषेक करने के लिए कांवडि़ए गंगोत्री, गौमुख, ऋषिकेश और हरिद्वार से गंगाजल लेकर आ रहे हैं। इनके साथ मनोहर झांकियां है तो साथ ही तमाम मुश्किलों को जीतकर बाबा के दरबार में पहुंचकर जलाभिषेक करने का जज्बा भी है। कांवड़ मार्ग में इन दिनों सिर्फ आस्था का सैलाब नजर आ रहा है। इनमें ना तो उम्र की सीमा है और ना ही जाति का बंधन, बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक सभी हाथों में कांवड़ थामे अपने आराध्य की एक झलक पाने के लिए बेताब होकर चल पड़े हैं।

मैं भी भोला, तू भी भोला

कांवड़ यात्रा की खास बात यह हैं यहां बच्चे लेकर बुजुर्ग तक भी सबकी पहचान ही उनके आराध्यदेव बाबा भोलेनाथ से जुड़ जाती है। सभी एक दूसरे को भोले के नाम से ही संबोधित करते हैं। दूर-दराज से आए कांवडि़यों में आपसी सहयोग और परस्पर सद्भाव भी देखने को मिल रहा है।

बच्चों में भी उत्साह

कांवड़ यात्रा में जहां युवाओं में उत्साह है। तो वहीं, 10 से 15 साल के बच्चे भी हाथों में गंगाजल थामे तपती जमीन दौड़े चले जा रहे हैं। बालमन में शिवशंकर की विराट छवि उनकी तमाम दुश्वारियों को छोटा कर रही है।

मुझे पहली बार बाबा ने बुलाया है। आस्था के आगे हर मुश्किल आसान हो जाती है। अगली बार भी बाबा की कांवड़ लेकर जरूर आउंगा।

सागर

मैं पहली बार कांवड़ लेकर दिल्ली जा रहा हूं। पहली बार आस्था का यह रंग देखकर खुद को भाग्यशाली समझ रहा हूं।

कुनाल

मैं पहली बार आया हूं, गर्मी तो है, जमीन भी तपती है, लेकिन बाबा का आशीर्वाद है, इसलिए सब कुछ बेअसर सा लगता है।

रवि

रिजल्ट के लिए मैंने मन्नत मांगी थी, वो भोलेबाबा ने पूरी की। इसलिए पहली बार कांवड़ लेकर आया हूं। बाबा का आशीष रहा तो हर बार आउंगा।

गोलू

भगवान ने मेरी एक खास मनोकामना पूरी की है। इसलिए मैं भी पहली बार कांवड़ लेकर आया हूं।

विशाल

दर्द हजार लेकिन भोला करेंगे पार

कांवड़ मार्ग पर महिला कांवडि़यों की भी अच्छी खासी संख्या देखी जा रही है। इनमें हर महिला की अपनी खास कहानी है। किसी की मन्नत पूरी हुई तो कोई बाबा के दरबार में पहली बार कुछ मांगने जा रही है।

विश्वास है, जरूर सुनेंगे भोले

कांवड़ मार्ग में तपती जमीन पर नंगे पैर हाथों में कांवड़ थामे महिला कांवडि़यों का कहना है विश्वास है उनकी फरियाद को भोले बाबा जरूर सुनेंगे।

पति ने छोड़ा, परमेश्वर का सहारा

हरिद्वार से नंगे पैर कांवड़ लेकर आ रही 55 वर्षीय कैलाश कुमारी ने बताया कि वे बीते 16 साल से कांवड़ लेकर आ रही हैं। उनके पति ने उन्हे छोड़ दिया है। इसलिए तमाम मुश्किलों में जीवन गुजर रहा है, लेकिन अब जीवन के अंतिम पड़ाव में बाबा की भक्ति ही उन्हें हौंसला और आगे बढ़ने का जज्बा देती है। इसलिए वे हर साल कांवड़ लेकर आती हैं।

बच्चे रहें खुश

हाथों में कांवड़ थामे 60 वर्षीय बिंदू की भी कहानी अलहदा है। दिल्ली निवासी बिंदू बताती हैं कि वे हर साल नंगे पैर कांवड़ लेकर आती हैं। उनकी भोले बाबा से यही मन्नत है कि उनके बच्चे सदैव खुश रहें। हालांकि इस बार बच्चे उनकी उम्र को देखकर कांवड़ ले जाने के लिए मना कर रहे थे, लेकिन बिंदू नहीं मानी और कांवड़ थामकर अपने आराध्य के दर्शनों के लिए चल पड़ीं।


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