क्या आप समझाने की अनुकंपा करेंगे कि रहस्यस्कूल का ठीकठीक कार्य क्या है? ओशो

2019-05-15T09:22:32Z

प्रेम अपने साथ सृजन की सभी संभावनाएं सभी आयाम लेकर आता है। यह अपने साथ स्वतंत्रता लेकर आता है और संसार की बड़ी से बड़ी स्वतंत्रता यही है कि व्यक्ति को 'स्वयं' होने दिया जाए

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KANPUR: क्या आप समझाने की अनुकंपा करेंगे कि रहस्य-स्कूल का ठीक-ठीक कार्य क्या है?

तुम सौभाग्यशाली हो कि तुम आज यहां हो, क्योंकि हम गुरु-शिष्य के बीच वार्ता की एक नई शृंख्ला का प्रारंभ कर रहे हैं। यह एक नई पुस्तक का जन्म ही नहीं है, यह एक न आयाम की घोषणा भी है। एक दिन इस क्षण को एक ऐतिहासिक क्षण की भांति स्मरण किया जाएगा, और तुम सौभाग्यशाली हो क्योंकि तुम इसमें सहभागी हो। तुम इसे  निर्मित कर रहे हो, बिना तुम्हारे यह संभव नहीं। 'उपनिषद' का अर्थ है- सदगुरु के चरणों में बैठना। इसका और कुछ अधिक अर्थ नहीं है, बस गुरु की उपस्थिति में रहना, उसे अनुमति दे देना कि वह तुम्हें अपने स्वयं के प्रकाश में, अपने स्वयं के आनंद में, अपने स्वयं के संसार में ले जाए और ठीक यही कार्य रहस्य-विद्यालय का भी है।
गुरु के पास आनंद व प्रकाश है
गुरु के पास वह आनंद, वह प्रकाश है और शिष्य के पास भी है परंतु गुरु को पता है और शिष्य गहन निद्रा में है। रहस्य-विद्यालय का कुल कार्य इतना ही है कि शिष्य को होश में कैसे लाया जाए, उसे कैसे जगाया जाए, कैसे उसे स्वयं उसे होने दिया जाए, क्योंकि शेष सारा संसार उसे कुछ और बनाने की चेष्टा कर रहा है। दुनिया में कोई भी तुममें, तुम्हारी संभावना में, तुम्हारी वास्तविकता में, तुम्हारे अस्तित्व में उत्सुक नहीं है। प्रत्येक का अपना निहित स्वार्थ है, उनका भी जो तुम्हें प्रेम करते हैं लेकिन उनसे नाराज मत हो, क्योंकि वे भी उनते ही पीडि़त और परेशान हैं जितने कि तुम। वे भी उतने ही मूच्र्छित, बेहोश हैं, जितने कि तुम। वे सोचते हैं कि जो कुछ वे कर रहे हैं वह प्रेम है लेकिन वे जो कर रहे हैं वह सच में तुम्हारे अहित में है और प्रेम कभी किसी के अहित में नहीं हो सकता।
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ऐसे लोग स्वंय अपने विषय में कुछ नहीं जानते
प्रेम या तो होता है या फिर नहीं होता साथ ही प्रेम अपने साथ सृजन की सभी संभावनाएं, सृजन के सभी आयाम लेकर आता है। यह अपने साथ स्वतंत्रता लेकर आता है और संसार की बड़ी से बड़ी स्वतंत्रता यही है कि व्यक्ति को 'स्वयं' होने दिया जाए लेकिन न तो माता-पिता, न पड़ोसी, न शिक्षा व्यवस्था, न ही मंदिर-मस्जिद-चर्च, न राजनीतिज्ञ-कोई भी नहीं चाहता कि व्यक्ति स्वयं हो सके क्योंकि उनके लिए यह सर्वाधिक खतरनाक बात है। जो लोग स्वयं होते हैं, उन्हें गुलाम नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने स्वतंत्रता का स्वाद ले लिया है, अब उन्हें वापस गुलामी में घसीटना संभव नहीं। इसलिए बेहतर यही है कि उन्हें स्वतंत्रता का, उनके अपने अस्तित्व का, उनकी संभावना का, उनकी क्षमता, उनके भविष्य का, उनकी प्रतिभा का उन्हें स्वाद ही नहीं लेने दिया जाए। अपने पूरे जीवन वे अंधकार में टटोलते, दूसरे अंधे लोगों से राह पूछते रहें, जो स्वयं अपने विषय में कुछ नहीं जानते।



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