ऐसे पहचान करें असली और नकली इंसानों की ओशो

2019-06-26T19:05:07Z

बाहर से जो दिखाई पड़ता है वही हम देख सकते हैं लेकिन अपने तो हम भीतर जा सकते हैं वहां तो हम देख सकते हैं हम कौन हैं? एक आदमी मंदिर में बैठ कर माला जप रहा है भगवान का नाम ले रहा है।

पहली तो बात यह है, दूसरे के संबंध में सोचें ही मत कि वह असली है या नकली है। सिर्फ नकली आदमी ही दूसरे के संबंध में इस तरह की बातें सोचता है। अपने संबंध में सोचें कि मैं नकली हूं या असली। और अपने संबंध में सोचना ही संभव है और जानना संभव है। इसलिए पहली बात है, हमारा चिंतन निरंतर दूसरे की तरफ लगा होता है, कौन दूसरा कैसा है। नकली आदमी का एक लक्षण यह भी है, स्वयं के संबंध में नहीं सोचना और दूसरों के संबंध में सोचना। असली सवाल यह है कि मैं कैसा आदमी हूं और इसे जान लेना बहुत कठिन नहीं है, क्योंकि सुबह से सांझ तक, जन्म से लेकर मरने तक मैं अपने साथ जी रहा हूं और अपने आपको भलीभांति जानता हूं।
न केवल मैं दूसरों को धोखा दे रहा हूं, अपने को भी धोखा दे रहा हूं। मेरी जो असली शक्ल है, वह मैंने छिपा रखी है। और जो मेरी शक्ल नहीं है, वह मैं दिखा रहा हूं, वह मैंने बना रखी है। दिन भर में हजार बार हमारे चेहरे बदल जाते हैं। असली आदमी तो वही होगा, सुबह भी सांझ भी। एक फकीर था नसरुद्दीन, एक सम्राट की पत्नी से उसका प्रेम था। एक रात वह अपनी प्रेमिका से विदा ले रहा है और उसने उस स्त्री को कहा, तुझसे ज्यादा सुंदर स्त्री पृथ्वी पर दूसरी नहीं है और मैंने सिर्फ तुझे ही चाहा है। मेरे प्राणों में बस तेरे अतिरिक्त और किसी की कामना और आकांक्षा नहीं है। वह स्त्री आनंद से भर गई, उसकी आंखें खुशी से भर गईं और तभी उस फकीर ने कहा, ठहर, ठहर, मैं तुझे यह भी बता दूं कि यही बात दूसरी स्त्रियों से भी मैं कहता रहा हयह फकीर अदभुत आदमी रहा होगा और इस क्षण में इसने अपने नकलीपन को भी पहचाना होगा और अपने असलीपन को भी जाहिर करने की हिम्मत की। हम सब पहचानते हैं कि हम नकली हैं। हम जैसे दिखाई पड़ते हैं वैसे हैं?

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यह किसी दूसरे के संबंध में सोचने का सवाल नहीं है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे के भीतर प्रवेश नहीं कर सकता, बाहर से ही देख सकता है। बाहर से जो दिखाई पड़ता है वही हम देख सकते हैं, लेकिन अपने तो हम भीतर जा सकते हैं, वहां तो हम देख सकते हैं हम कौन हैं? एक आदमी मंदिर में बैठ कर माला जप रहा है, भगवान का नाम ले रहा है। बाहर से दिखाई पड़ता है वह माला जप रहा है, भगवान का नाम ले रहा है। धार्मिक पूजा और प्रार्थना में तल्लीन है। हम तो बाहर से इतना ही देख सकते हैं, लेकिन वह आदमी भीतर से देख सकता है कि वह क्या कर रहा है? यह माला यंत्र की तरह हाथ फेर रहे हैं। यह राम का जप होंठों पर मशीन की तरह हो रहा है। भीतर क्या हो रहा है? वह आदमी सच में क्या कर रहा है?



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