बिजनेस की लैंग्वेज अंग्रेजियत नहीं कैलकुलेटर है

2015-06-02T07:00:21Z

-भारत और पाक में जरूरत बन चुकी इंग्लिश भाषा पर कराची से आए व्यापारी ने किया कटाक्ष

-इंडियन-पाक व्यापार, अमेरिका, मलाला को लेकर खुलकर रखी मेहमान व्यापरियों ने राय

BAREILLY: रिश्तों में गरमाहट के लिए आयोजित इंडो-पाक फैशन ट्रेड फेयर एंड फूड फेस्टिवल में पब्लिक की खूब चहलकदमी देखी गई। पाकिस्तानी सामान लोगों को खूब पसंद आ रहे हैं। बिजनेस में मशगूल फ्रेंडशिप फेयर में मेहमान व्यापारियों से आई नेक्स्ट ने कई मुद्दों पर बात की। एक सी बोली, एक से पहनावे और लगभग एक सी परेशानियों से जूझते दोनों मुल्कों के बारे क्या सोचते हैं, ये पाकिस्तानी व्यापारी। आइए जानते हैं

अंग्रेजियत के पीछे न भागें

पाकिस्तान सरजमीं पर भी अंग्रेजियत यानि इंग्लिश भाषा की दुश्वारियां लोगों को डराती हैं। ये बातें प्रदर्शनी में शिरकत कर रहे है तमाम पाकिस्तानी व्यापारियों ने स्वीकार किया। उनका कहना था कि यूरोपियन कंट्री की तरह भारत और पाकिस्तान को भी अपनी राष्ट्र भाषा को कामकाज में अपनाना चाहिए। पाकिस्तानी बिजनेसमेन अब्दुल सबूर कहना है कि हम बिजनेस के नाम पर हम इंग्लिश विक्टिम बन गए हैं। जबकि मैं अपने अनुभवों की बात करूं तो तमाम कंट्री में मैंने स्टाल लगाएं हैं, लेकिन बिजनेस की भाषा कैलकुलेटर रही न कि इंग्लिश। इंडो-पाक प्रदर्शनी पर अपनी राय देते हुए अब्दुल सबूर ने इसे सराहनीय कदम बताया, लेकिन उन्होंने पाकिस्तान में आयोजित प्रदर्शनी में इंडियन बिजनेसमैन के कम शिरकत करने पर दुख जाहिर किया। उनका कहना था कि इंडियन बिजनेसमैन को भी पाकिस्तान आकर इस तरह की नुमाइशों में हिस्सा लेना चाहिए। दोनों मुल्क के रिश्तों पर जमी बर्फ को पिघलाने में व्यापार मददगार हो सकता है।

मलाला पर बंटे दिखे पाकिस्तानी

शांति का नोबेल पुरस्कार पाकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने साहस और अधिकारों की लड़ाई में एक मुकाम हासिल कर चुकी मलाला यूसुफजई पर पाकिस्तानियों में एक बदलाव की चमक दिखाई पड़ती है। मलाला का जिक्र छेड़ते ही प्रदर्शनी में मौजूद इशरत ने ख्वाहिश जाहिर की कि वे अपनी बेटियों को मलाला जैसा बनाना चाहती हैं। एक अन्य व्यापारी सैय्यद मंजू अहमद का कहना है कि औरतों की आजादी के लिए औरतों को ही कदम उठाने की जरूरत है.इन्होंने मलाला को बदलाव की बयार कहा, लेकिन करांची से आए पाकिस्तानी हिंदू व्यापारी घनश्याम महेश्वरी ने मलाला के बारे में सी इज द अमेरिकन कहकर टिप्पणी की। इन मेहमानों से अमेरिका के बारे में राय जाननी चाही, तो मो अजहर बोले कि इस ताकतवर मुल्क से किसी भी तरह का ताल्लुकात रखना हमारी मजबूरी है। घनश्याम कहते हैं कि चीन हमारा दोस्त मुल्क है, पाकिस्तानी जनता अमेरिका से नफरत करती है।

सफलता को छू गई इशरत

महिलाओं की लिटरेसी और अधिकारों की आजादी के मामले में यूं तो पाकिस्तान को दकियानकूस माना जाता है, लेकिन यहां की इशरत सफदर ने अपनी हिम्मत के दम पर सभी बेडि़यों को तोड़कर सफलता के परचम लहराए। ख्009 में शौहर के अचानक इंतकाल के बाद इशरत ने अपने फ् बच्चों की परवरिश के लिए घरेलू खातून का चोला उतारा और कपड़े के कारोबार की नींव डाली। सिर्फ म् साल में इशरत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने सफदर फैब्रिक स्टोर के स्टॉल लगाने लगी हैं। कपड़ा व्यापार की हब सिटी फैसलाबाद निवासी इशरत अपनी दो बेटियों को इंडिया का बड़ा फैन बताती हैं। बरेली से पहले ये लखनऊ, आगरा, कानपुर में भी अपने स्टॉल्स लगा चुकी हैं। इल्म की ताकत को जरूरी मानने वाले इशरत अपनी दोनों बेटियों को पढ़ा रही हैं, और ये चाहती हैं कि वह अपना जीवनसाथी मनमर्जी से चुनें।

Posted By: Inextlive

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