पेरेंट्स बोले गाइडलाइन फॉलो नहीं करते स्कूल

2019-07-21T11:00:20Z

पेरेंट्स परेशान, स्कूल संचालक चुप

बच्चों के भारी बस्ते को लेकर प्रशासन ने भी साधा मौन

Meerut। बच्चों का मासूम बचपन उनके भारी बस्तों के बोझ तले दब गया है। नाजुक कंधों पर बैग का कई-कई गुना बोझ देखने के बाद स्कूल संचालकों ने चुप्पी साध रखी है। यही नहीं शासन-प्रशासन की तमाम गाइडलाइंस की भी खुलेआम धज्जियां उड़ रही हैं। क्लास दर क्लास बच्चों के बैग का वजन बढ़ता ही जा रहा है। दैनिक जागरण आई नेक्स्ट की टीम ने जमीनी हकीकत पर इसकी तहकीकात की तो स्थिति काफी भयावह मिली।

स्कूलों की सलाह

पेरेंट्स बच्चों को लाइट वेट बैग प्रोवाइड कराएं।

बच्चों के लिए स्कूल बैग सही साइज के लें।

स्कूल में बच्चों को टाइमटेबल के हिसाब से बैग लगाकर भेजें

स्कूलों में कम पेज वाली नोट बुक्स को लागू किया जाए।

ये कहते हैं पेरेंट्स

सीबीएसई और एचआरडी मिनिस्ट्री ने बैग के लिए गाइडलाइन जारी की है। उसके बावजूद स्कूल नियमों का पालन नहीं करते हैं। जिसका खामियाजा बच्चों और पेरेंट्स को भुगतना पड़ता है। इसकी वजह से बच्चों की ग्रोथ पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

सचिन सोनी, राष्ट्रीय महासचिव, ऑल स्कूल पेरेंट्स एसोसिएशन

गाइडलाइंस बनती हैं लेकिन किसी को इनकी परवाह नहीं होती है। स्कूल अपने मनमाने तरीके से पढ़ाई कराते हैं। पूरा शेड्यूल भी स्कूल ही तय करते हैं। ई-बुक्स वाला कांसेप्ट स्कूल कर ही नहीं सकते। इससे स्कूलों का बिजनेस खत्म होने का खतरा जो रहता है।

शैंकी वर्मा, पेरेंट्स

बच्चों का बैग बहुत भारी होता है। कई-कई किलो के बैग बच्चे उठा नहीं पाते हैं। हमें ही इनका बैग उठाना पड़ता है। स्कूलों की ओर से हर साल बुक्स और नोट बुक्स बढ़ा दी जाती है। स्कूल किसी की नहीं सुनते नहीं हैं। प्रशासन भी कुछ नहीं कहता है।

कल्पना पांडेय, पेरेंट्स

ये कहते हैं स्कूल संचालक

स्कूलों में बच्चों को बकायदा टाइमटेबल से बैग लगाकर लाने के लिए कहा जाता है। पेरेंट्स को भी इस संबंध में रेग्यूलर अवेयर किया जाता है। हमने बच्चों को सही पोश्चर के लिए बैग का डायग्राम भी डिस्पले किया है। भारी बैग का इश्यू काफी क्रिटिकल है और पेरेंट्स और स्कूल संचालक मिलकर ही इसे सॉल्व कर सकते हैं।

एचएम राउत, सीबीएसई सिटी कोर्डिनेटर

लॉजिकली फ‌र्स्ट क्लास के स्टूडेंट के बैग में सिर्फ 5-6 बुक्स और 5-6 नोट्स बुक्स होती हैं। एक वॉटर वॉटल, लंच और पेंसिल बॉक्स होता है। इनका वेट इतना नहीं होता। जबकि आज कल बच्चे जो बैग कैरी करते हैं उनका वेट बहुत ज्यादा होता है। हैवी बैग की वजह से वेट बढ़ जाता है। जबकि स्कूल में बुक्स और नोट्स का वेट इतना नहीं होता है।

राहुल केसरवानी, सहोदय सचिव

मेट्रो सिटीज की तरह हम अपने यहां नो होमवर्क, नो बैग का कांसेप्ट लागू नहीं कर पा रहे हैं। मेन रीजन पैरेंट्स चाहते हैं कि वह अपने बच्चे की पढ़ाई से अपडेट रहे। ऐसे में बच्चे को क्लास वर्क और होमवर्क दोनों की कॉपियां कैरी करनी पड़ती हैं। बुक्स भी कैरी करता है। ऐसे में लाजमी है कि उसका बैग भारी हो जाता है।

मधु सिरोही, प्रिंसिपल, मेरठ पब्लिक स्कूल फॉर ग‌र्ल्स वेस्ट एंड रोड


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