सऊदी राजकुमारी की पांच ख्वाहिशें

2012-04-10T14:38:00Z

बीबीसी से खास बातचीत में सऊदी अरब की राजकुमारी बस्मा बिंत सईद बिन अब्दुल अजीज ने कई चीजें बताईं जो वो अपने देश में बदलना चाहेंगी

लेकिन इस सूची में महिलाओं को गाड़ी चलाने का अधिकार नहीं है, बकौल राजकुमारी जिसका वक्त अभी नहीं आया है. राजकुमारी बस्मा की क्या ख्वाहिशें ये पढ़िए उनकी ही जुबानी

पांच बदलाव

मैं अपनी ये बातें सऊदी अरब के पूर्व शासक किंग सऊद की बेटी के हैसियत से रख रही हूं. मेरे पिता ने देश में गुलामी की प्रथा को खत्म की, महिलाओं के लिए पहला विश्वविद्यालय खोला और एक ऐसी शाही सत्ता को स्थापित करने की कोशिश की जिसमें राजा का पद प्रधानमंत्री से अलग हो. लेकिन दुख की बात है कि मेरे देश ने उन वादों को अब तक नहीं निभाया है.

एक बेटी, बहन, पूर्व पत्नी, मां, व्यवसायी और पत्रकार की हैसियत से मैं चाहूंगी की ये पांच चीजें हमारे देश में बदले :

1) संविधान

मैं एक ऐसा संविधान चाहती हूं जो देश में पुरुष और महिलाओं को बराबर अधिकार दे. एक ऐसा संविधान बने जो हमारे नागरिक कानून का आधार हो.

अभी सऊदी अदालतों में सभी फैसले इस बात पर निर्भर करते हैं कि न्यायाधीश पवित्र कुरान की किस तरह व्याख्या कर रहा है. ये पूरी तरह उसकी अपनी शिक्षा और व्यक्तिगत सोच पर निर्भर करता है. सभी को मान्य किसी लिखित संविधान को गाइड मानकर फैसले नहीं लिए जाते.

मैं किसी पश्चिमी संविधान की वकालत नहीं कर रही हूं. मैं चाहती हूं कि कुरान की मूल्यों को ध्यान में रखते हुए ऐसा संविधान बनाया जाए जो पत्थर पर लेख कि तरह दृढ़ हो और किसी एक न्यायाधीश की व्याख्या पर आधारित न हो. हमारे संविधान में सभी नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा हो और सभी को कानून के सामने बराबर समझा जाए.

2) तलाक के कानून

मैं मानती हूं कि हमारा तलाक का कानून गलत है. एक महिला को तभी तलाक मिल सकता है जब वो या तो तलाक के लिए लाखों डॉलर पैसे दे या फिर वो जिस वजह से तलाक मांग रही है उसका कोई गवाह मौजूद हो. ये दोनों बिल्कुल मुश्किल बात है क्योंकि महिलाएं घर की चारदीवारी में रहती है और वहां कोई बाहरी गवाह लाना मुश्किल बात है.

इसके अलावा तलाक लेने पर छह साल से ज्यादा उम्र के बच्चे अपने आप पिता के हवाले हो जाते हैं जिस वजह से महिलाओं को तलाक लेना मुश्किल लगता है. मेरे हिसाब से ये कानून कुरान के विरुद्ध है.

3) शिक्षा की व्यवस्था को पूरी तरह बदलना

हमारे देश में महिलाओं के साथ जिस तरह का बर्ताव किया जाता है वो पूरी तरह हमारी शिक्षा व्यवस्था की वजह से है. हमारा सिलैबस बेहद खतरनाक है. उदाहरण के तौर पर बच्चों को सिखाया जाता है कि महिलाएं पुरुष से गौण होती हैं. समाज में उसकी भूमिका सिर्फ परिवार की सेवा करना और बच्चों को पालना तक सीमित रखा जाता है.

यहां तक कि बच्चों को पढ़ाया जाता है कि अगर आपको खुदा के अलावा किसी और की इबादत करनी हो तो वो आपका पति ही है. ये सब कुरान की गलत व्याख्या से हुआ है.

इसके अलावा हमारी शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह कुरान और धार्मिक पढाई पर आधारित है. बच्चों को यो बताया जाता है कि इसके अलावा कुछ और पढ़ने से जन्नत नहीं मिलती इसलिए कुछ और पढ़ने में समय बर्बाद नहीं करना चाहिए.

पुराने समय में इस्लामी बुद्धिजीवी विज्ञान और साहित्य में महारत रखते थे. हमारा धर्म एक ऐसी ढाल नहीं होनी चाहिए जिसके पीछे हम छुपे रहें बल्कि हमें समाज में योगदान देने के लिए प्रेरणा दे.

4) सामाजिक व्यवस्था में बदलाव

सामाजिक मामलों का मंत्रालय देश में महिलाओं के खिलाफ अत्याचार को देख रहा है लेकिन महिलाओं की रक्षा के लिए कुछ नहीं कर रहा है. महिलाओं के शरण के लिए जो जगहें हैं वहां जाने पर उन्हें बताया जाता है कि उन्होंने अपने परिवार को शर्मसार किया है.

अगर ये महिलाएं शक्तिशाली परिवारों से होती हैं तो उन्हें वापस भेज दिया जाता है जिसकी वजह से कई डॉक्टर और वैज्ञानिक जैसी पढ़ी लिखी महिलाएं आत्महत्या करने पर मजबूर हो रही हैं.

5) महरम की भूमिका

सऊदी अरब में महिलाएं घर से बाहर किसी मेहरम यानी पुरुष रिश्तेदार केबिना अकेले नहीं निकल सकती. पुराने समय में जब यहां लुटेरों से भरा रेगिस्तान होता है उस वक्त ये नियम जायज था. लेकिन आज इस तरह के कानून का सिर्फ एक ही मकसद है - महिलाओ की आजादी पर लगाम लगाना.

'अभी कार चलाने का समय नहीं आया'

ये अधिकार यहां अभी महिलाओं के पास नहीं है. मैं इसके खिलाफ नहीं हूँ लेकिन मेरा मानना है कि इससे भी जरूरी दूसरे बदलाव है जो हमें पहले चाहिए. उनके बिना अगर ड्राइविंग का अधिकार दे दिया गया तो कोई गलती होने पर लोग कहेंगे देखिए पहले ही कहा था कि महिलाओं को गाड़ी नहीं चलानी चाहिए.

समाज में बराबरी के अधिकार मिलना पहले जरूरी है जिससे महिलाओं को भी बराबर अधिकार मिलेगा.

Posted By: Inextlive

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