रबींद्रनाथ टैगोर की ये बातें आज भी हैं बड़े काम की

2019-05-07T13:51:58Z

नोबेल पुरस्कार विजेता रबींद्रनाथ टैगोर ने एक नहीं बल्‍क‍ि दो मुल्‍कों के राष्‍ट्रगान ल‍िखे हैं। आइए आज उनकी 158वीं जयंती पर जानें उनसे जुड़ी वो खास बातें जो आज भी बड़े काम की हैं

कानपुर। रबींद्रनाथ टैगोर को गुरुदेव भी कहा जाता है। इनका जन्म 7 मई 1861 में कोलकाता में जोरासंको हवेली में हुआ था। बचपन से ही इन्हें साहित्य में काफी रुचि थी। इन्होंने सामाजिक सुधारों में भी विशेष भूमिका की। रबींद्रनाथ टैगोर ने 1913 में साहित्य में नोबेल पुरस्कार जीता था।
पहले ऐसे शख्स जिनके लिखे गीत दो मुल्कों के बने राष्ट्रगान

साहित्य में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले ये पहले गैर-यूरोपीय शख्स हैं। मिड डे की एक रिपोर्ट के मुताबिक ये पहले ऐसे शख्स हुए जिनकी दो रचनाएं दो देशों में नेशनल एंथम के रूप में गाई जाती हैं। इसमें एक भारत का जन गण मन...और बांग्लादेश का अमार शोनार बांग्ला...गाया जाता है।

केवल पानी पर खड़े हो व देखकर समुद्र पार नहीं कर सकते

टैगोर की कुछ बातों से जीने का तरीका बदला जा सकता है। वह कहते थे कि केवल पानी पर खड़े व देखकर समुद्र पार नहीं कर सकते हैं। इसके लिए कदम बढ़ाना होगा। इतना ही नहीं वह कहते थे विश्वास वह पक्षी है जो प्रभात के पूर्व अंधकार में ही प्रकाश का अनुभव करता है और गाने लगता है।

रबींद्रनाथ टैगोर ने विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना की

टैगोर का पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन से गहरा नाता है। यह कला साहित्य का एक अलग रूप दिखता था। 1863 में इनके पिता ने यहां ब्रह्मो समाज आश्रम और विद्यालय के रूप में एक आश्रम की स्थापना की थी। इसमे बाद यहां रबींद्रनाथ टैगोर ने विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना की थी।

शांतिनिकेतन में सेल्फ-हेल्प मूवमेंट का किस्सा है दिलचस्प

शांतिनिकेतन में सेल्फ-हेल्प मूवमेंट (अपना काम अपने हाथ) की शुरुआत का किस्सा भी काफी दिलचस्प है। द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर की पहली मुलाकात 6 मार्च, 1915 को शांतिनिकेतन में हुई थी। इस दौरान दोनों लोगों ने साथ बैठकर बात की थी।
आज ही हुई थी गांधी और टैगोर की पहली मुलाकात, फिर शुरू हुआ यह मूवमेंट
महात्मा गांधी की यह बात रबींद्रनाथ टैगोर को आ गई थी रास
इस मुलाकात के गांधी जी ने रबींद्रनाथ टैगोर से कहा कि छात्र पढ़ाई के साथ अपना काम भी खुद करें। छोटे-छोटे कामों के लिए शांतिनिकेतन में अलग से नौकर रखने की जरुरत नहीं है। ऐसे में 10 मार्च, 1915 को टैगोर की सहमति से शांतिनिकेतन में सेल्फ-हेल्प मूवमेंट की शुरुआत हुई थी।



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