सच्चा भक्त बनने के लिए मन का शुद्ध व निस्वार्थ होना बहुत जरूरी : सद्गुरु जग्गी वासुदेव

Updated Date: Mon, 09 Mar 2020 12:33 PM (IST)

एक भक्त का अपना कोई एजेंडा नहीं होता। उसका एकमात्र लक्ष्य होता है कि वह अपनी भक्ति की वस्तु में अपने इष्टदेव में विलीन हो जाना चाहता है। उसका कोई दूसरा उद्देश्य नहीं होता। तभी भक्ति आपके लिए काम करेगी। एक संदेह करने वाले मन के साथ भक्ति की कोशिश न करें।

भक्ति आपकी भावनाओं को इतना मधुर बनाने के लिए है कि आपके जीवन का अनुभव सुंदर हो जाए लेकिन अभी, भक्ति के रूप में जो हो रहा है वह बस एक धोखा है। भक्ति के बारे में लोगों की सोच यह है, 'भगवान, मैंने आपके लिए नारियल फोड़ा है, आप मुझे कल क्या देने वाले हैं?' यह भक्ति नहीं है, यह एक खराब सौदा है। मान लीजिए आपके साथ मैं एक सौदा करने की कोशिश करता हूं। जहां मैं आपको दस रुपए देता हूं लेकिन आपको मुझे दस करोड़ रुपए देने होंगे। क्या आप इस सौदे को करने को इच्छुक होंगे? हर कोई भगवान के साथ इसी किस्म का

सौदा करने की कोशिश कर रहा है। आप इतने चतुर तो हैं ही कि आप मेरे साथ ऐसा सौदा नहीं करेंगे। आपको बनाने वाले को कम से कम आपसे थोड़ा ज्यादा चतुर होना चाहिए लेकिन आप सोचते हैं कि वो सबसे ज्यादा मूर्खतापूर्ण सौदा करेगा।

मैं चाहता हूं कि आप जान लें कि वो सौदा नहीं करेगा। धरती पर धर्म इतने कुटिल इसलिए बन गए हैं क्योंकि भक्ति ने बहुत कपटपूर्ण रूप ले लिया है। तो भक्त बनने की कोशिश करना समय की बरबादी है। ऐसा नहीं है कि आपमें भक्ति बिल्कुल भी नहीं है। हो सकता है कि भक्ति के कुछ पल रहे हों लेकिन आप एक भक्त होने के काबिल नहीं हैं। एक भक्त का अपना कोई एजेंडा नहीं होता। उसका एकमात्र लक्ष्य होता है कि वह अपनी भक्ति की वस्तु में, अपने इष्टदेव में विलीन हो जाना चाहता है। उसका अपने जीवन में कोई दूसरा उद्देश्य नहीं होता। सिर्फ तभी भक्ति आपके लिए काम करेगी। एक सवाल करने वाले मन के साथ, एक संदेह करने वाले मन के साथ भक्ति की कोशिश मत कीजिए। यह जीवन की बरबादी होगी।

आज की दुनिया में, लोग इस तरह के बने हैं अगर भगवान सामने प्रकट होता है, वे उसके सामने समर्पण नहीं करेंगे, वे छानबीन करने की मांग करेंगे- वह वाकई भगवान है या नहीं? इस तरह के मन के साथ आप भक्त नहीं बन सकते। एक समय ऐसा था जब इंसान में सबसे महत्वपूर्ण चीज उसकी भावना थी। आज, आपके अंदर भावना सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं है। फिर भी यह आपमें सबसे तीव्र हिस्सा है। अधिकतर लोग अपने भौतिक शरीर को तीव्रता के ऊंचे स्तर तक नहीं ले जा पाते। शरीर को तीव्र रखने के लिए बहुत अधिक प्रयास करना होता है। बहुत कम लोग इसमें सक्षम हैं। सिर्फ कुछ थोड़े से लोग ही अपने मन को बहुत तीव्र रखने के काबिल हैं। लोगों में उनके मन की तीव्रता आती- जाती रहती है लेकिन बहुत कम लोग मन को बस यूं ही तीव्र रखने में सक्षम हैं।

ऊर्जा के मामले में लोग आमतौर पर बिल्कुल भी तीव्र नहीं हैं। वे तीव्रता के सिर्फ कुछ खास पल ही जानते हैं। तीव्रता को लगातार कायम रखना नहीं लेकिन भावना बहुत तीव्र हो सकती है। अगर प्रेम में नहीं तो कम से कम गुस्से में आप तीव्र हो जाते हैं। कुछ भावनाओं में आप तीव्र होना जानते हैं अगर मैं आपको प्रेम या आनंद में तीव्र नहीं बना सकता तो अगर मैं आपको भलाबुरा कहूं, तो कम से कम आप गुस्से में तीव्र हो जाएंगे- एक ऐसे स्तर तक जहां आप पूरी रात नहीं सो पाएंगे। अगर मैं आपको कहता हूं, 'कृपया बैठे रहें और जगे रहें। मैं योग सिखाऊंगा।' आप सो जाएंगे लेकिन अगर मैं आपको गाली दूं, तो आप पूरी रात जागते बैठे रहेंगे। क्रोधी लोग सो नहीं सकते, है न? तो इंसानों में भावना हमेशा से एक महत्वपूर्ण चीज रही है।

भक्ति के असली स्वरूप को जानने की जरूरत

भक्ति- योग अपनी भावना को नकारात्मकता से प्रसन्नता में रूपांतरित करने का तरीका है। बस इस पर ध्यान दीजिए कि जिन लोगों को प्रेम हो गया है वे इसकी परवाह नहीं करते कि दुनिया में क्या हो रहा है। वे जिस तरह से हैं, आपको लगता है कि वे हकीकत में नहीं जी रहे हैं। बात बस इतनी है कि उन्होंने अपनी भावनाओं को सुखद बना लिया है तो उनका जीवन सुंदर है। एक भक्त की यही अवस्था होती है। भक्ति एक प्रेम संबंध का एक बढ़ा हुआ और उन्नत रूप है। एक भक्त उस किस्म के प्रेम संबंध में होता है जो निरंतर चलता रहता है अगर आपको

किसी आदमी या औरत से प्रेम हो जाता है और अगर वे उस तरह से नहीं चलते, जैसे आप उनसे उम्मीद करते हैं, तो यह आखिर में किसी मुश्किल में पड़ जाता है। इसीलिए लोगों ने भगवान को चुना। यह बस एक प्रेम संबंध होता है और आप किसी जवाब की उम्मीद नहीं करते। तब आपका जीवन अत्यंत सुंदर हो जाता है क्योंकि आपकी भावनाएं बहुत मधुर हो गई हैं। उस मधुरता के जरिए व्यक्ति विकास करता है। यही भक्ति है।

-सद्गुरु जग्गी वासुदेव

Posted By: Vandana Sharma
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